फ़ास्टब्रीडर रिएक्टर कार्यक्रम को तेज़ करने की जरूरत

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Published By Deepak Mishra
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रनबीर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

 

कलपक्कम में चालू किया गया प्रोटोटाइप फ़ास्ट फ्रीडर रिएक्टर हमारी न्यूक्लियर इंजीनियरिंग उद्यमिता को दर्शाने के अलावा विशाल थोरियम भंडारों का उपयोग करने की दिशा में एक तसल्ली बख्श कदम है।

इस महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु में कल्पक्कम पहुंचे और 500 मेगाइलेक्ट्रान क्षमता तक बिजली बनाने वाले एक 'प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर'  को इनके सामने चालू किया गया। परमाणु संयंत्र ने सफलतापूर्वक 'क्रिटिकैलिटी' हासिल की। भारत पहले से ही यूरेनियम खनिज को एनरिच करके और बाहर से खरीद कर भी 20 परमाणु संयंत्रों को चलाकर बिजली बना रहा है। भारत के इस पहले चरण में परमाणु विद्युत् ऊर्जा उत्पादन के लिए संवृद्ध यूरेनियम-235 का इस्तेमाल होता है। दूसरे चरण के विकास में थोरियम खनिज से विद्युत् उत्पादन आता है, जिसके लिए पहले टेस्ट रिएक्टर बनाया गया और अब पूरी क्षमता का फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर बना कर चालू किया है, जिसके लिए थोरियम खनिज से प्राप्त प्लूटोनियम का इस्तेमाल हुआ है। 

इसे फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में इस्तेमाल होने वाले फ्यूल ग्रेड मटीरियल में बदलने की प्रक्रिया में न्यूट्रॉन एक्टिवेशन, यूरेनियम-233 का विखंडन, ऊर्जा का उपयोग और लगातार ब्रीडिंग वाले चरण शामिल होते हैं। थोरियम-232 एकल/सिंगल न्यूट्रॉन सोख लेता है  और थोरियम-233 में बदल जाता है जो टूटकर प्रोटैक्टिनियम-233 बनता है। यह आगे टूटकर यूरेनियम-233 बन जाता है, जिसका विखंडन होता है और इस प्रक्रिया में यह ऊर्जा और अतिरिक्त न्यूट्रॉन पैदा करके कुछ और विखंडन उत्पाद बनता है। विखंडन से मिली ऊर्जा गर्मी में बदल जाती है, जिसका इस्तेमाल फिर बिजली बनाने के लिए किया जाता है।

थोरियम को प्रॉसेस करके एक न्यूक्लियर फ्यूल के तौर पर काम में लाया जा सकता है, भले ही वह शुरू में विखंडनीय न हो। रिएक्टर की कोर में ऐसी व्यवस्था की जाती है, जिससे यूरेनियम-233 की लगातार ब्रीडिंग होती है और नियंत्रित तरीके से उसका इस्तेमाल संभव है। थोरियम फ्यूल आधारित रिएक्टर प्रॉसेस्ड और एनरिच्ड और मिक्स्ड ऑक्साइड फ्यूल के इस्तेमाल और कचरा कम करने के मामले में ज़्यादा कुशल हैं। 

थोरियम फ्यूल साइकिल को यूरेनियम-आधारित न्यूक्लियर रिएक्टरों के एक व्यवहार्य पूरक विकल्प के तौर पर पहचान मिली है, क्योंकि इसमें न्यूक्लियर सुरक्षा, प्रसार और स्थिरता है। भारत ने इस विकल्प को इसलिए चुना है, क्योंकि हमारे पास केरल के समुद्र तट पर थोरियम का विशाल भंडार है, जो अगले पांच सौ साल तक बिजली की वर्तमान खपत बढ़ने के बाद भी ख़त्म नहीं होने वाला नहीं। संवर्द्धित यूरेनियम सप्लायर देशों पर इससे हमारी निर्भरता कम हो जाएगी। हमारा फास्ट ब्रीडर रिएक्टर सोडियम तरल से ठंडा किया जाता है। थोरियम-आधारित परमाणु ऊर्जा के प्रति चीन का दृष्टिकोण भी पारंपरिक ठोस-ईंधन वाले फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टरों की तुलना में अलग तरह से डिज़ाइन किया गया है। 

चीन मुख्य रूप से मोल्टन सॉल्ट रिएक्टरों को विकसित करने में अग्रणी है, जो पारंपरिक रिएक्टरों में इस्तेमाल होने वाली ठोस ईंधन छड़ों के बजाय तरल ईंधन का उपयोग करते हैं। भारत ने ऐसा नहीं किया, बल्कि सुरक्षा कारणों की समीक्षा करके प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के लिए यूरेनियम-प्लूटोनियम मिक्स्ड ऑक्साइड फ्यूल राड्स का इस्तेमाल किया है। थोरियम-232 का इस्तेमाल कोर के चारों ओर एक ठोस ब्लैंकेट सामग्री के तौर पर किया जाता है, ताकि भविष्य में इस्तेमाल के लिए यूरेनियम-233 बनाया जा सके। इस तरह यह तरल ईंधन के इस्तेमाल के बजाय एक ठोस-अवस्था वाली ब्रीडिंग प्रक्रिया बन जाती है।  

कलपक्कम में चालू किया गया प्रोटोटाइप फ़ास्ट फ्रीडर रिएक्टर हमारी न्यूक्लियर इंजीनियरिंग उद्यमिता को दर्शाने के अलावा विशाल थोरियम भंडारों का उपयोग करने की दिशा में एक तसल्ली बख्श कदम है। रूस के बाद, भारत ने ही कमर्शियल-स्केल पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर चला कर यह क्षमता हासिल की है। प्रोटोटाइप रिएक्टर में लिक्विड सोडियम कूलेंट का इस्तेमाल करके यूरेनियम-238 को प्लूटोनियम-239 में बदला जाता है। कलपक्कम में स्थापित इस पहले प्रोटोटाइप रिएक्टर का डिजाईन स्थित इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र ने और फेब्रिकेशन इंजीनियरिंग का कार्य भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड ने किया है। इस कार्य में 200 से ज़्यादा भारतीय उद्योगों का अहम योगदान रहा है, जिसने साबित किया है कि परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए सभी तरह की प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग में हमें इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर लिया है। 

कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की 500 मेगा इलेक्ट्रान वोल्टस विद्युत उत्पादन इकाई के लिए मॉक्स-फ्यूल या मिक्स्ड-ऑक्साइड ईंधन इस्तेमाल हुआ है। यह एक ऐसा परमाणु ईंधन है, जिसे प्लूटोनियम ऑक्साइड को यूरेनियम ऑक्साइड के साथ मिलाकर बनाया जाता है। मॉक्स-फ्यूल मुख्य रूप से प्लूटोनियम ऑक्साइड से बना होता है, जिसे प्राकृतिक, क्षीण अथवा डिप्लीटेड अथवा पुनर्संसाधित यूरेनियम ऑक्साइड के साथ मिलाया जाता है।  (यह लेखक के निजी विचार हैं।)