बावनी इमली : वह पेड़ जिस पर क्रांतिकारियों को दी गई थी फांसी
जब भी 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की चर्चा होती है, हमारे मन में कुछ तयशुदा नाम उभरते हैं, जैसे रानी लक्ष्मी बाई, मंगल पांडेय, नाना साहब पेशवा आदि। इतिहास की किताबों ने इन्हें बड़े और उभरे अक्षरों में लिखा है, यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि हर कथा को कुछ चेहरे चाहिए होते हैं, लेकिन कभी-कभी यही चेहरे इतने बड़े हो जाते हैं कि बाकी कहानी पीछे छूट जाती है। सवाल यह नहीं कि इनका महत्व कम है, बल्कि यह कि क्या कोई क्रांति सचमुच तीन-चार नामों से पूरी हो जाती है?- भगवंत अनमोल, वरिष्ठ साहित्यकार
कानपुर के आसपास के लोग अब अजीमुल्लाह खान, तात्या टोपे या अजीजन बाई जैसे नाम भी जानने लगे हैं, लेकिन अगर आप कानपुर से कुछ ही दूरी पर बसे फतेहपुर की ओर मुड़ें, तो कहानी अचानक धीमी हो जाती है। यहां इतिहास किताबों से ज्यादा लोगों की यादों में बसा है। फतेहपुर जिले में बिंदकी तहसील में एक जगह है- बावनी इमली। नाम सुनकर यह कोई साधारण-सा पेड़ लगता है, लेकिन 28 अप्रैल आते ही यह जगह एक तारीख से जुड़ जाती है और तारीख एक कहानी से।
1857 की हलचल में फतेहपुर भी चुप नहीं बैठा था, चुप नहीं बैठा था कहना सही नहीं होगा, बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था। खागा गढ़ी के ताल्लुकेदार ठाकुर दरियाव सिंह के नेतृत्व में इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को मार खदेड़ा था। कहा जाता है कि यह इलाका करीब 34 दिनों तक अंग्रेजों की हुकूमत से मुक्त रहा। यह ‘मुक्ति’ कितनी संगठित थी, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इतना तय है कि यहां के वीर सिर्फ दर्शक नहीं थे, इस मिट्टी में भी उतनी ही क्रांति और आग थी, जितनी अन्य स्थानों पर। गंगा-यमुना के दोआब पर बसे इस जिले ने कई वीर दिए, जिनमें ठाकुर दरियाव सिंह, उनके पुत्र सुजान सिंह, भाई निर्मल सिंह, डिप्टी कलेक्टर हिकमत उल्लाह खान, बाबा गयादीन दुबे, ठाकुर शिवदयाल सिंह और ठाकुर जोधा सिंह अटैय्या जैसे नाम उस समय की स्थानीय धड़कन थे, जिन्हें आज भी फतेहपुर के बाहर कम ही लोग जानते हैं।
जोधा सिंह अटैय्या की कथा तो किसी लोकगाथा जैसी लगती है- लगान देने से इंकार करना, गुरिल्ला युद्ध, तहसीलों और कोषागारों पर हमले, अंग्रेजी सत्ता को लगातार चुनौती और फिर जंगल में घुस जाना। जब मेरठ, कानपुर और झांसी की क्रांति की ज्वाला मंद पड़ गई थी, तो फतेहपुर के इन वीरों की क्रांति अंग्रेजों को हतोत्साहित किए हुए थी। जोधा सिंह अपने साथियों के साथ ऐसे निकलते और ऐसा छुपते थे, जैसे गुफा में छुपा शेर अपना शिकार देखते ही शिकार कर लेता और फिर गुफा में चला जाता। अंग्रेजों की इतनी बुरी हालत हो गई थी कि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि इस वीर से युद्ध कैसे किया जाए।
कभी-कभी ही उनके क्रांतिकारी दिखते और जब दिखते तो इतने संगठित तरीके से कि अंग्रेजों के पास मौका ही न बचता उनके वार से बचने के लिए और फिर गायब, सुदूर अपनी गुफा में। अंग्रेजों ने उन्हें ‘डाकू’ कहा, जो इतिहास में असहमति को छोटा करने का पुराना तरीका रहा है। आखिरकार भीतर से मिली एक सूचना ने उन्हें पकड़वा दिया। इसके बाद 28 अप्रैल 1858 का दिन आया, जब खजुहा में एक इमली के पेड़ के नीचे कर्नल क्रिस्टाइल द्वारा जोधा सिंह सहित 52 क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई।
जोधा सिंह अटैय्या वही क्रांतिकारी थे, जिन्होंने कर्नल नील, मेजर-जनरल हैवलॉक और रेनाल्ड जैसे क्रूर अंग्रेज अफसरों को चकमा दे दिया था और कर्नल पॉवेल का सर धड़ से अलग करके उनके छावनी भेज दिया था। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। स्थानीय लोगों की मानें तो अंग्रेजों ने शवों को ले जाने की अनुमति नहीं दी और लंबे समय तक उस स्थान पर पहरा रहा। 37 दिनों तक वह शव उसी पेड़ पर लटकते रहे और अपने क्रांतिकारी होने की सजा भुगतते रहे। जब शव सड़ने लगे, तो अंग्रेजों को जबरन उस इमली के पेड़ के पास से अपनी फौज हटानी पड़ी। फिर ठाकुर भगवान दास ने 4 अप्रैल 1858 को इन अमर सपूतों का अंतिम संस्कार किया। समय बीतता गया और वह स्थान धीरे-धीरे एक स्मृति में बदलता गया। आज भी वहां इमली का पेड़ खड़ा है, जस का तस, शायद पहले से अधिक शांत, जितना उनका इतिहास हो गया है।
इतिहास का अपना एक स्वभाव होता है, वह याद रखने के मामले में बहुत निर्दयी है, जिनके पास अपने समय के लेखक, कवि और इतिहासकार होते हैं, वे बड़े अक्षरों में दर्ज हो जाते हैं, बाकी लोग जगहों, पेड़ों और किस्सों में छूट जाते हैं। यही कारण है कि दिल्ली की एक छोटी घटना पूरे देश में फैल जाती है और किसी सुदूर गांव की बड़ी घटना अपने इलाके तक सीमित रह जाती है। फतेहपुर के बिंदकी स्थित ‘बावनी इमली’ एक ऐसा ही स्मारक है, जहां एक पेड़ के नीचे खड़े होकर आप समझ सकते हैं कि आजादी की कहानी सिर्फ कुछ नामों की नहीं, बल्कि अनगिनत अनसुने लोगों की भी है। ऐसे वीरों को शत-शत नमन करते हैं, जिनके कारण हम आजादी की सांस ले रहे हैं। अगर आप अपने वजूद को पहचानना चाहते हैं, अपने देश की आजादी की लौ को महसूस करना चाहते हैं, तो एक बार बिंदकी स्थित बावनी इमली के दर्शन जरूर करें और ऐसे वीरों को प्रणाम करें।
