पौराणिक कथा: जहां भाव, वहां भगवान

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Published By Anjali Singh
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बहुत समय पहले वृंदावन में एक कृष्णदास नाम के बाबा रहते थे। एक बार उन्होंने किसी ग्रंथ में पढ़ा कि यदि कोई सेवा बिना नागा किए लगातार बारह वर्ष तक की जाए, तो साधक को मनचाहा फल अवश्य मिलता है। बाबा ने निश्चय किया- वे बारह वर्ष तक प्रतिदिन ठाकुर जी को माला पहनाएंगे, और फलस्वरूप बस यही चाहेंगे कि तेरहवें वर्ष के पहले दिन स्वयं ठाकुर जी उनकी कुटिया पर आकर उनसे माला ग्रहण करें।-प्रमोद श्रीवास्तव

उस दिन से बाबा की सेवा आरंभ हो गई। वे प्रतिदिन मंदिर जाते, प्रेम से माला पहनाते और मुस्कुराकर कहते—“लाला, अब इतने दिन हो गए, बस इतने दिन और।” समय बीतता गया और देखते-देखते बारह वर्ष पूर्ण होने को आए। अंतिम दिन बाबा ने बड़े विश्वास से कहा—“मेरी सेवा पूर्ण हुई, अब कल आपको मेरी  कुटिया पर आना ही होगा। मैं छप्पन भोग सजाकर प्रतीक्षा करूंगा।”

अगले दिन बाबा भोर में उठे, स्नान किया, कुटिया सजाई और छप्पन भोग तैयार कर दिए। फिर वे पूरे दिन ठाकुर जी की राह देखते रहे। समय बीतता गया- दोपहर, संध्या, फिर रात्रि… यहां तक कि मंदिर में शयन आरती भी हो गई, पर ठाकुर जी नहीं आए। अब बाबा का हृदय टूट गया। वे क्रोध और वेदना में भर उठे

—“मेरी ही भूल थी, मैं किसी और की आराधना करता तो अच्छा होता!” क्रोध में उन्होंने कुटिया उजाड़ दी, उपवन नष्ट कर दिया और छप्पन भोग की पोटली बांधकर चल पड़े।

चलते-चलते उन्होंने सोचा-“बारह वर्ष कृष्ण को दिए, अब बारह दिन श्रीजी को देकर देखता हूं।” और वे बरसाना की ओर बढ़ चले। मार्ग में अचानक गायों का विशाल झुंड आ गया। बाबा किनारे खड़े हो गए। समय बीतता गया, पर गायों का अंत न हुआ। तभी एक नन्हा ग्वाला दिखाई दिया। बाबा ने पूछा- “ये किसकी गायें हैं?” ग्वाले ने हंसकर कहा- “नंद भवन की हैं, पूरी नौ लाख। अभी देर लगेगी, आप बैठ जाइए।”

बाबा थके और भूखे थे। ग्वाले ने उनकी पोटली से आती सुगंध पाकर कहा- “मुझे भी थोड़ा खाने को दे दो।” बाबा ने पोटली खोली। ग्वाले ने कहा- “मेरे हाथ गंदे हैं, आप अपने हाथ से खिला दीजिए।” जैसे ही बाबा ने पहला कौर उसके मुख में रखा, उसकी आंखें भर आईं। बाबा ने पूछा—“क्या हुआ?” ग्वाला बोला—“आज सुबह से प्रतीक्षा कर रहा था, किसी ने मुझे माला नहीं पहनाई।” इतना सुनते ही बाबा चौंक उठे- “अरे, कन्हैया तू!” और वे उसे गले से लगा बैठे।

ठाकुर जी ने अपना दिव्य रूप प्रकट किया। बाबा भाव-विभोर हुए, पर अगले ही क्षण बोले-“अब समझा, आज तू क्यों आया है। जब तेरी ओर से हटकर मैंने श्रीजी की ओर कदम बढ़ाया, तब तू दौड़ा चला आया। जब एक कदम पर तू मिल गया, तो यदि मैं उनके चरणों में ही समर्पित हो जाऊं, तो क्या होगा!” यह कहकर बाबा बरसाना की ओर दौड़ पड़े। ठाकुर जी उन्हें रोकने के लिए पीछे-पीछे भागे। अंततः बाबा ने शेष जीवन श्रीजी के चरणों में समर्पित कर दिया और कृष्णदास से किशोरीदास बन गए।