गिद्धों की अद्भुत जीवन रक्षा तकनीक

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Published By Anjali Singh
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गिद्ध एक ऐसा पक्षी, जिसे अक्सर उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है, लेकिन वही प्रकृति का सबसे कुशल सफाईकर्मी है। अपनी अद्भुत पाचन शक्ति, अनोखी जीवन-रक्षा तकनीक और सामाजिक व्यवहार से गिद्ध पर्यावरण को स्वच्छ और संतुलित बनाए रखते हैं। प्रस्तुत है गिद्धों का वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व। आसमान में अथाह ऊंचाइयों पर हवा में तैरते, धरती पर पसरे सन्नाटे के साक्षी गिद्धों को देखकर मन में आकर्षण नहीं, बल्कि एक प्रकार की उपेक्षा का भाव ही पैदा होता है। उनका गंजा सिर, भारी सशक्त चोंच और मृत जीवों पर निर्भर जीवनशैली उन्हें ‘अप्रिय’ पक्षियों की पंक्ति में खड़ा कर देती है। किंतु यदि हम प्रकृति को उसके वास्तविक स्वरूप में समझने का प्रयास करें, तो यही गिद्ध हमें पृथ्वी के सबसे महत्वपूर्ण और कुशल सफाईकर्मी के रूप में दिखाई देते हैं, ऐसे प्रहरी जो बिना किसी पहचान या प्रशंसा के हमारे  जीवन रक्षा तकनीक , गिद्ध पक्षी ,  कुशल सफाईकर्मी ,पर्यावरण  संतुलित , अमृत विचार फीचर पेज , फीचर पेज , यूरेका  बनाए रखने में सहायक होते हैं।- डॉ. कैलाश चन्द सैनी

जटायु और सम्पाती का गौरव 

भारतीय संस्कृति और रामायण के अमर प्रसंगों में गिद्ध केवल पक्षी नहीं, बल्कि उच्च आदर्शों और त्याग के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

जटायु: शौर्य और त्याग का प्रतीक

जब रावण माता सीता का हरण कर ले जा रहा था, तब वृद्ध जटायु ने ही अपनी क्षीण होती शक्ति की परवाह किए बिना उसका मार्ग रोका और वीरतापूर्वक युद्ध किया। यह केवल संघर्ष नहीं, बल्कि नारी-सम्मान की रक्षा का अद्वितीय उदाहरण था। भगवान राम द्वारा जटायु का अंतिम संस्कार स्वयं करना, इस पक्षी की श्रेष्ठता और त्याग का प्रमाण है।  

सम्पाती: दूरदृष्टि का अद्भुत उदाहरण

जटायु के ज्येष्ठ भ्राता सम्पाती ने अपनी असाधारण तीक्ष्ण दृष्टि से हज़ारों मील दूर लंका में सीता जी की उपस्थिति को पहचान लिया था। यह प्रसंग गिद्धों की उस विलक्षण दृष्टि-क्षमता की ओर संकेत करता है, जिसे आज का आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है। गिद्ध 3-4 किलोमीटर की ऊंचाई से भी धरती पर पड़े 3 फुट के मवेशी को भी देख लेता है। 

पैरों पर विसर्जन: एक अनूठी जीवन बचाने की तकनीक  

पहली नज़र में यह व्यवहार विचित्र लगता है कि गिद्ध अपने ही पैरों पर मूत्र विसर्जन करते हैं। लेकिन यह कोई असामान्य आदत नहीं, बल्कि उनके लिए एक अत्यंत उपयोगी वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसे यूरोहाइड्रोसिस कहा जाता है। गिद्धों के पास पसीने निःसृत करने वाली ग्रंथियाँ नहीं होतीं। भीषण गर्मी में, जब अधिकांश जीव पसीने के माध्यम से शरीर का तापमान नियंत्रित करते हैं, ऐसे में पैरों पर तरल का विसर्जन ‘वाष्पीकरण द्वारा शीतलन’ का कार्य करता है, जो उनके शरीर को ठंडा रखता है।

प्राकृतिक सैनिटाइजर

सड़े-गले मांस के संपर्क में रहने से उनके पैरों पर अनेक हानिकारक जीवाणु चिपक जाते हैं। इनके मूत्र में उपस्थित अम्लीय तत्व इन जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा समाप्त हो जाता है। यह प्रक्रिया उन्हें एक प्रकार की प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधक सुरक्षा प्रदान करती है।

सुदृढ़ पाचन शक्ति: प्रकृति की जैविक प्रयोगशाला

गिद्धों का पाचन तंत्र किसी चमत्कार से कम नहीं। उनके पेट में मौजूद प्रबल अम्ल एंथ्रैक्स, हैजा और बोटुलिज़्म जैसे खतरनाक बैक्टीरिया को भी नष्ट कर देता है। वास्तव में, वे प्रकृति की जैविक प्रयोगशाला हैं, जो मृत शवों का निस्तारण कर पर्यावरण को संक्रमण-मुक्त बनाए रखते हैं।  

सामाजिक सूचना तंत्र और उड़ान 

गिद्धों की उड़ान अद्वितीय है। वे हवा की गर्म धाराओं का उपयोग करते हुए बिना पंख फड़फड़ाए घंटों तक आकाश में मंडराते रहते हैं, जिससे ऊर्जा की अत्यधिक बचत होती है।  इनका सामाजिक व्यवहार भी अत्यंत रोचक है। एक गिद्ध जब मृत पशु देखता है तो किसी ऊँचे वृक्ष पर बैठकर विशेष प्रकार से ‘चैंव-चैंव’ की आवाज निकालते हुए गर्दन घुमाकर कुछ संकेत करता है। इस संकेत में यह सूचना होती है कि मरे हुए पशु की किस्म, स्थान और कितने गिद्धों के लिए भोजन उपलब्ध है। इस आवाज को जो भी दूसरा गिद्ध सुनता है, वह उसी तरह का संकेत अपने पीछे वाले गिद्धों के लिए भी कर देता है। भोजन की मात्रा के अनुसार गिद्ध एकत्र होने पर सबसे पहले खबर देने वाले को आगे चलने का सम्मान देते हैं, क्योंकि उसे उस पशु के मांस का सबसे नरम भाग खाने का अधिकार होता है। ऐसी सामाजिकता और न्यायप्रिय उदारता यदि मनुष्यों में भी होती तो समाज में लूट-खसोट न होती।

पारिस्थितिकी संकट और संरक्षण

भारत में एक समय गिद्धों की संख्या में तीव्र गिरावट देखी गई, जिसका मुख्य कारण पशुओं में प्रयुक्त दवा दर्दनिवारक दवा डाइक्लोफेनाक था। इस दवा के अवशेष वाले मृत पशुओं को खाने से गिद्धों की मृत्यु होने लगी। गिद्धों की कमी से पर्यावरण में सड़न और आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ी, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि वे केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के अभिन्न रक्षक हैं।

उपेक्षा से उपयोगिता की ओर

गिद्ध हमें यह गहरा संदेश देते हैं कि प्रकृति में कोई भी जीव अनावश्यक नहीं होता। उनका हर व्यवहार चाहे वह कितना ही असामान्य क्यों न लगे जीवन के संतुलन के लिए जरूरी होता है। वे गंदगी के बीच रहकर भी संसार को स्वच्छ बनाते हैं, और मृत्यु के बीच रहकर भी जीवन की रक्षा करते हैं। वास्तव में, गिद्ध केवल सफाईकर्मी नहीं, बल्कि प्रकृति के वे ऐसे नेकनीयत रखने वाले नायक हैं, जो बिना किसी पहचान के हमारी पृथ्वी को सुरक्षित और पर्यावरण को स्वस्थ बनाए रखने में निरंतर लगे हुए हैं।- डॉ. कैलाश चन्द सैनी,वन्य जीव विशेषज्ञ, जयपुर