वैज्ञानिक फैक्ट : अंतरिक्ष में डकार लेना क्यों होता है मुश्किल
पृथ्वी पर डकार लेना एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है। जब हम भोजन करते हैं या पानी पीते समय हवा निगल लेते हैं, तो वह गैस पेट में जमा हो जाती है और बाद में डकार के रूप में बाहर निकलती है। यहां गुरुत्वाकर्षण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह भोजन और तरल पदार्थों को पेट के निचले हिस्से में बनाए रखता है, जबकि गैस ऊपर की ओर आ जाती है और आसानी से मुंह के रास्ते बाहर निकल जाती है।
वहीं अंतरिक्ष में स्थिति बिल्कुल अलग होती है। वहां लगभग शून्य गुरुत्वाकर्षण यानी माइक्रोग्रैविटी होती है। ऐसी अवस्था में गैस, तरल और ठोस पदार्थ अलग-अलग परतों में नहीं बंट पाते। परिणामस्वरूप पेट में मौजूद हवा भोजन और तरल के साथ मिश्रित रहती है। यही कारण है कि अंतरिक्ष यात्री सामान्य तरीके से डकार नहीं ले पाते। यदि वे डकार लेने की कोशिश करें, तो गैस के साथ पेट का तरल पदार्थ और भोजन भी मुंह तक आ सकता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘वेट बर्प’ कहा जाता है, जो काफी असहज अनुभव हो सकता है।
इसी वजह से अंतरिक्ष यात्रियों के खानपान पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उन्हें ऐसे खाद्य पदार्थ कम दिए जाते हैं, जो पेट में ज्यादा गैस बनाते हों, जैसे कार्बोनेटेड ड्रिंक्स या अत्यधिक मसालेदार भोजन। अंतरिक्ष मिशनों में भोजन को इस प्रकार तैयार किया जाता है कि वह आसानी से पच जाए और गैस की समस्या कम पैदा करे।
नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार, अंतरिक्ष में केवल डकार ही नहीं, बल्कि शरीर की कई सामान्य प्रक्रियाएं भी बदल जाती हैं। उदाहरण के लिए, माइक्रोग्रैविटी के कारण शरीर के तरल पदार्थ ऊपर की ओर खिसकने लगते हैं, जिससे अंतरिक्ष यात्रियों का चेहरा सूजा हुआ दिखाई देता है। वहीं पैरों में रक्त और तरल कम पहुंचता है। अंतरिक्ष में पाचन तंत्र भी पृथ्वी की तुलना में अलग तरीके से काम करता है।
कई अंतरिक्ष यात्रियों ने बताया है कि वहां भोजन का स्वाद थोड़ा फीका लगता है, क्योंकि शरीर के तरल ऊपर आने से नाक बंद जैसी स्थिति बन जाती है। यही कारण है कि अंतरिक्ष यात्री अधिक तीखे और मसालेदार भोजन को पसंद करने लगते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि लंबे अंतरिक्ष मिशनों जैसे मंगल ग्रह की यात्रा के लिए मानव शरीर पर माइक्रोग्रैविटी के प्रभावों को समझना बेहद जरूरी है। डकार जैसी छोटी लगने वाली प्रक्रिया भी अंतरिक्ष विज्ञान में महत्वपूर्ण शोध का विषय बन चुकी है। यह दिखाता है कि पृथ्वी पर सामान्य दिखने वाली हमारी कई शारीरिक क्रियाएं वास्तव में गुरुत्वाकर्षण पर कितनी निर्भर हैं।
