बंगाल : शाह की रणनीति और मोदी का करिश्मा

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Published By Deepak Mishra
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पश्चिम बंगाल ने एक बार फिर अपना पुराना राजनीतिक इतिहास दोहराया है। यहां की जनता सत्ता परिवर्तन के लिए किसी एक पार्टी को भरपूर बहुमत देने की परंपरा रखती है।

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विवेक शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

 

पश्चिम बंगाल ने एक बार फिर अपना पुराना राजनीतिक इतिहास दोहराया है। यहां की जनता सत्ता परिवर्तन के लिए किसी एक पार्टी को भरपूर बहुमत देने की परंपरा रखती है। इस बार यह पुरस्कार और आशीर्वाद भारतीय जनता पार्टी को मिला है। बंगाल की जनता ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि पूरे देश और विदेश के राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। परंतु और किंतु की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी। एक स्पष्ट, भारी जनादेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के भरोसे पर दिया गया है।

देश ही नहीं, विदेश के राजनीतिक आलोचक भी भाजपा की करामाती लीडरशिप पर हैरान हैं। आखिर यह पार्टी जनता का विश्वास कैसे जीत लेती है? लोग कह रहे हैं-पहले ओडिशा और अब बंगाल। कमाल है कमाल! हिंदी पट्टी से अपनी यात्रा शुरू करने वाली भाजपा अब सर्वव्यापी होती जा रही है।

राजनीति में चोर दरवाजे से घुसने वालों की सफलता अक्सर अल्पकालिक होती है। शॉर्टकट कोई स्थाई फॉर्मूला नहीं है। भाजपा इस सच्चाई को सबसे बेहतर समझती और मानती है। वह सतत प्रयास, निरंतरता और अथक परिश्रम पर विश्वास रखती है। बंगाल में मिली इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे भी यही कहानी है। इस बार का नेतृत्व आक्रामक कार्यशैली वाला है। प्रधानमंत्री मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व और अमित शाह की फूलप्रूफ रणनीति इसकी मजबूत नींव बनी।

बंगाल जीतना भाजपा के लिए लोहे के चने चबाने जैसा था। कई चुनौतियां थीं। सबसे बड़ी चुनौती राज्य की जनसंख्या संरचना थी। यहां देश का सबसे बड़ा मुस्लिम वोट बैंक है। लगभग 85 विधानसभा सीटों का फैसला मुस्लिम मतदाता करते हैं, जो पारंपरिक रूप से भाजपा को वोट नहीं देते। 2021 में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इन 85 मुस्लिम प्रभावित सीटों में से 75 पर जीत हासिल की थी। इस बार भी कुल मिलाकर करीब उतनी ही सीटें टीएमसी के पास दिख रही हैं, लेकिन बड़ा बदलाव यह है कि मुस्लिम वोट का एक हिस्सा भाजपा की ओर छिटक गया।

मुस्लिम महिलाओं और युवाओं ने भाजपा पर भरोसा जताया। मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और अमित शाह के धरातलीय प्रयासों का यह नतीजा है। शाह ने मुस्लिम मतदाताओं को राजनीतिक समीकरण का यंत्र बनने के बजाय आर्थिक सशक्तिकरण का भागीदार बनाने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने सभी वर्ग की महिलाओं के साथ मुस्लिम महिलाओं को भी यकीन दिलाया कि भाजपा सरकार में उन्हें बिना भेदभाव के लाभ मिलेंगे। खासकर मासिक आर्थिक सहायता का वादा-टीएमसी के दावों से दोगुना, यानी हर महीने ₹3,000। यह संदेश घर-घर पहुंचा।

भाजपा की बंगाल विजय का सबसे बड़ा कारण राजनीतिक हिंसा पर पूर्ण अंकुश था। ममता बनर्जी सत्ता बचाने के लिए कम्युनिस्ट-युग की हिंसा की नीति पर चल रही थीं। समर्थक को संरक्षण, विरोधी का दमन। चुनाव के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले, फांसी तक की घटनाएं आम थीं। टीएमसी ने लोकतंत्र को ताख पर रख दिया था। इस बार गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव आयोग के साथ मिलकर केंद्रीय सशस्त्र बलों की भारी तैनाती की।

स्थानीय गुंडों और पुलिस की मनमानी बंद हुई। शाह का सख्त संदेश- ‘मतदान के बाद किसी को प्रताड़ित किया तो उल्टा लटकाएंगे’ ने आम मतदाता के मन से भय निकाल दिया। नतीजतन, मतदान प्रतिशत 90 के पार पहुंच गया।
पहले कहा जाता था कि भाजपा के पास बंगाल में कोई स्वीकार्य स्थानीय चेहरा नहीं है। पार्टी नेतृत्व इस कमी को समझता था।

इस बार रणनीति बदली गई। शुभेंदु अधिकारी अकेले नहीं, कई स्थानीय चेहरे आगे आए। भवानीपुर से ममता बनर्जी के खिलाफ शुभेंदु को उतारना अमित शाह का मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ। तृणमूल ने इसे ‘बंगाली अस्मिता बनाम बाहरी’ का मुद्दा बनाने की कोशिश की, लेकिन शाह ने साफ कहा-बांग्ला बोलने वाला, बंगाल का ही मुख्यमंत्री बनेगा। लोगों ने इस यकीन को स्वीकार किया।

मोदी का जादू और जमीन स्तर पर मजबूत संगठन- यह कॉकटेल भाजपा के लिए काम करता रहा। ओडिशा चुनाव खत्म होते ही अमित शाह ने महासचिव सुनील बंसल को संगठन मजबूत करने भेजा। संघ के साथ समन्वय बढ़ाया गया। इस बार केवल धार्मिक ध्रुवीकरण पर निर्भरता नहीं रखी गई। बूथ स्तर तक कार्यकर्ता पहुंचे। देश भर से भाजपा कार्यकर्ता बंगाल पहुंचे और मतदाताओं को बूथ तक लाने का जिम्मा संभाला।

उलट टीएमसी नेतृत्व बिखरा नजर आया। ममता बनर्जी पर पूरा दारोमदार था, लेकिन वे खुद घिरी हुई थीं। अदालतों ने उनकी दलीलें खारिज कीं- चाहे एसआईआर का मामला हो या राज्य कर्मचारियों का। केंद्रीय बलों ने टीएमसी गुंडों की निगरानी की। टीएमसी ने भाजपा को ‘बांग्ला भाषा और संस्कृति के दुश्मन’ के रूप में चित्रित करने की कोशिश की, लेकिन भाजपा ने स्थानीय बांग्ला भाषी नेताओं की बड़ी टीम तैयार की। मिथुन चक्रवर्ती, स्वपन दासगुप्ता जैसे चेहरे भद्र बंगाली के प्रतीक बने। जातिगत और क्षेत्रीय नेताओं को भी जगह दी गई। प्रवासी बंगालियों तक पहुंच बनाई गई। (यह लेखक के निजी विचार हैं)