‘आप’ के लिए आत्ममंथन का समय

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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पिछले कुछ सालों में आम आदमी पार्टी से जिस तरह लोग गए हैं, अब उस पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। पार्टी के लिए यह आत्म मंथन का समय है। 

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जयदेव राठी, अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट

 

आम आदमी पार्टी की बिखरती झाड़ू अब सिर्फ विपक्षी दलों को दोष देकर नहीं बांधी जा सकती। 24 अप्रैल 2026 को दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस ने पार्टी की आंतरिक स्थिति को पूरी तरह उजागर कर दिया। राघव चड्डा के नेतृत्व में सात राज्यसभा सांसदों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया और भाजपा में विलय की घोषणा कर दी। यह विद्रोह कोई अचानक घटना नहीं है। यह लंबे समय से चली आ रही आंतरिक कलह, सिद्धांतों से समझौते और एक व्यक्ति केंद्रित सत्ता की परिणति है। 

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और केजरीवाल ने इसे ‘पंजाब के स्वाभिमान पर चोट’ और ‘गद्दारी’ करार दिया है, लेकिन सच्चाई यह है कि समस्या बाहरी नहीं, बल्कि पार्टी के अंदरूनी ढांचे में गहरी जड़ें जमाए हुए है। केजरीवाल को अब विपक्ष को कोसने के बजाय अपने अंदर झांकना चाहिए। वह पार्टी जो 2012 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली थी, आज उसी भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर गई है, जिसके खिलाफ उसने जन-आंदोलन छेड़ा था। सादगी, पारदर्शिता और आम आदमी के सिद्धांतों पर पार्टी बनी थी। 

सात सांसदों के इस्तीफे के पीछे के कारण स्पष्ट हैं। राघव चड्डा को हाल ही में राज्यसभा में डिप्टी लीडर के पद से हटा दिया गया था। उन्होंने पार्टी पर आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार अब ‘अनचेक’ हो गया है और व्यक्तिगत स्वार्थ हावी है। स्वाति मालीवाल, जो दिल्ली महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रहीं और केजरीवाल की करीबी मानी जाती थीं, ने भी ‘अनचेक भ्रष्टाचार’ का सीधा जिक्र किया। इससे पहले उन्होंने केजरीवाल के सहयोगी बिभव कुमार पर हमले का आरोप लगाकर पार्टी की छवि को झटका दिया था। 

हरभजन सिंह, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी, सभी ने सामूहिक रूप से यही कहा कि पार्टी मूल मिशन से भटक गई है। यह पहला विद्रोह नहीं है। आप की स्थापना के बाद से ही सिद्धांतों की हत्या, आंतरिक लोकतंत्र की कमी और केजरीवाल की तानाशाही शैली के आरोप लगते रहे हैं। 2014 में ही पार्टी के संस्थापक सदस्य शाजिया इल्मी ने इस्तीफा दे दिया।

उन्होंने खुलकर कहा कि पार्टी में ‘आंतरिक लोकतंत्र की कमी’ है, फैसले एक छोटे समूह द्वारा लिए जा रहे हैं और आलोचना को दबाया जा रहा है। इल्मी, जो पार्टी की शुरुआती चेहरा और प्रवक्ता थीं, बाद में भाजपा में शामिल हो गईं। उसी समय कैप्टन जीआर गोपीनाथ जैसे अन्य संस्थापक सदस्य भी निराश होकर चले गए और उन्होंने पार्टी की रणनीतियों पर सवाल उठाए।

2015 में पार्टी को सबसे बड़ा झटका लगा जब दो संस्थापक सदस्य योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को ‘गंभीर अनुशासनहीनता और एंटी-पार्टी गतिविधि’ के आरोप में निष्कासित कर दिया गया। यादव और भूषण ने केजरीवाल पर एकतरफा फैसले लेने, आंतरिक लोकतंत्र की हत्या और टिकट वितरण में भाई-भतीजावाद का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि ‘आप अब एक खाप पंचायत की तरह चल रही है, जहां एक छोटा समूह और तानाशाह सारे सपनों को तोड़ रहा है।’ उनके साथ आनंद कुमार और अजीत झा को भी बाहर कर दिया गया। 

2017-18 का दौर आया, जब एक के बाद एक विद्रोह हुए। कुमार विश्वास, 2018 के आसपास पार्टी से दूरी बनाने लगे। उन्होंने पारदर्शिता की कमी, खासकर राज्यसभा नामांकनों में अनियमितताओं का आरोप लगाया और कहा कि नेतृत्व अब सिद्धांतों से समझौता कर रहा है। 2018 में ही पत्रकार से राजनेता बने अशुतोष ने इस्तीफा दे दिया।

उसी साल अलका लांबा को पार्टी ने इस्तीफा देने को कहा। लांबा ने इसे ‘एंटी-पार्टी एक्टिविटी’ करार दिया। बाद में अल्का लांबा कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गईं। कपिल मिश्रा, जो केजरीवाल सरकार में मंत्री थे, 2017 में ही बागी हो गए। उन्होंने केजरीवाल पर भ्रष्टाचार का सीधा आरोप लगाया। कैबिनेट मंत्री सत्येंद्र जैन से करोड़ों रुपये नकद लेने का दावा किया। मिश्रा को कैबिनेट से हटा दिया गया और बाद में वे 2019 में भाजपा में शामिल हो गए।

एचएस फूलका, अशोक खेतान और कई अन्य दिल्ली इकाई के नेता भी इसी दौर में चले गए, आंतरिक लोकतंत्र की कमी और व्यक्तिगत स्वार्थ को वजह बताते हुए। आप पार्टी छोड़ चुके, नवीन जयहिंद ने भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए। पंजाब में भी 2022 विधानसभा चुनाव से पहले कम से कम 11 विधायकों ने या तो इस्तीफा दे दिया या अयोग्य ठहराए गए। हर बार असहमति को ‘गद्दारी’ या ‘विपक्षी साजिश’ बताकर दबाया गया, लेकिन समस्या जड़ में थी- केजरीवाल की एकल सत्ता और फैसलों की एकतरफा प्रक्रिया। (यह लेखक के निजी विचार हैं)