नृत्य उद्योग का आकार 45 अरब डॉलर से अधिक

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Published By Deepak Mishra
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श्वेता गोयल, शिक्षिका

 

मानव सभ्यता की सबसे पुरानी अभिव्यक्तियों में से एक है ‘नृत्य’। जब शब्द अस्तित्व में नहीं थे, तब शरीर की गति ही संवाद का माध्यम थी। समय के साथ नृत्य ने भिन्न-भिन्न संस्कृतियों में अनेक रूप धारण किए और आज यह विश्वभर में एक जीवित कला के रूप में स्थापित है। नृत्य अब वैश्विक संदर्भ में केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक कूटनीति का प्रभावी साधन बन चुका है।

नवीनतम ‘विश्व नृत्य रिपोर्ट’ के अनुसार, वैश्विक स्तर पर नृत्य उद्योग का आकार 45 अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया है। वर्चुअल नृत्य कार्यक्रमों में वर्ष 2020 के मुकाबले 2025 तक 60 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई है। नृत्य चिकित्सा को अब मानसिक स्वास्थ्य उपचारों में सम्मिलित किया जा रहा है। अनेक देशों में चिकित्सक अवसाद, चिंता और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याओं के उपचार में नृत्य आधारित विधियों का उपयोग किया जा रहा है।

विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं ने भी नृत्य को शिक्षा के एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में स्वीकार किया है, जिससे बच्चों में आत्मविश्वास, अनुशासन और सृजनात्मकता का विकास होता है। नृत्य की विविधता, उसकी समावेशिता और उसके सामाजिक महत्व का उत्सव मनाने के लिए प्रत्येक वर्ष 29 अप्रैल को ‘अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस’ मनाया जाता है। यह दिवस नृत्य को एक साझा मानव धरोहर के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसमें भौगोलिक सीमाओं, जाति, धर्म, भाषा या राजनीतिक विचारधाराओं की कोई बाधा नहीं होती।

इस अवसर पर करीब 170 देशों में एक साथ नृत्य महोत्सवों, कार्यशालाओं और सार्वजनिक प्रस्तुतियों का आयोजन किया जाता है। नृत्य परंपरा की दृष्टि से भारत विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। भारतीय नृत्य हजारों वर्षों से चली आ रही एक जीवंत और विकसित परंपरा है, जिसकी जड़ें वेदों, पुराणों, महाकाव्यों और शास्त्रों में गहराई से समाहित हैं। भारतीय नृत्य की विशिष्टता उसकी आध्यात्मिक गहराई, दार्शनिकता और सामाजिक प्रतिबद्धता में निहित है।

भारतीय नृत्य केवल सौंदर्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना का माध्यम है। नाट्यशास्त्र, जो लगभग दो हजार वर्ष पूर्व रचित एक विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ है, भारतीय नृत्य की बुनियादी संरचना और सिद्धांतों का आधार है। इस ग्रंथ में नृत्य, नाट्य और संगीत के तत्वों का अत्यंत वैज्ञानिक और विशद विवरण दिया गया है।

भारत में नृत्य की विविधता उसकी सांस्कृतिक विविधता की तरह अद्भुत है। प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक राज्य, यहां तक कि कई गांवों की भी अपनी विशिष्ट नृत्य परंपराएं हैं। भारत के शास्त्रीय नृत्य रूप जैसे भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कुचिपुड़ी, मोहिनीअट्टम, कथकली, मणिपुरी और सत्त्रिया, न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके हैं। इन सभी शास्त्रीय नृत्य शैलियों में अंग संचालन, हस्तमुद्राएं, नेत्र भाव, पद संचालन और ताल की अत्यंत जटिल विधियां हैं, जिन्हें साधना द्वारा वर्षों में सिद्ध किया जाता है।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य का एक प्रमुख उद्देश्य जीवन के रहस्यों को भावों के माध्यम से व्यक्त करना है। इनमें नौ रसों का विशेष महत्व है, श्रृंगार, वीर, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक, वीभत्स, अद्भुत और शांत। एक सिद्ध नर्तक या नर्तकी अपने अभिनय द्वारा दर्शकों को इन रसों की अनुभूति कराता है और उन्हें एक आत्मिक यात्रा पर ले जाता है। भारतीय लोक नृत्य समृद्ध और विविधतापूर्ण हैं।