घुमंतू व वंचित समुदायों में शिक्षा से जुड़ाव बेहद कम
भारत में घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों की स्थिति पर नीति आयोग और यूनेस्को जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट बताती हैं कि इन समुदायों के बच्चों का नामांकन और निरंतर शिक्षा से जुड़ाव बेहद कम है। भारत में प्राथमिक स्तर पर नामांकन दर लगभग 95 प्रतिशत तक ही पहुंच सकी है।
भारत में घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों की स्थिति पर नीति आयोग और यूनेस्को जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट बताती है कि इन समुदायों के बच्चों का नामांकन और निरंतर शिक्षा से जुड़ाव बेहद कम है। राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो भारत में प्राथमिक स्तर पर नामांकन दर लगभग 95 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, लेकिन घुमंतू समुदायों के बच्चों में यह दर कई क्षेत्रों में 60 से 70 प्रतिशत तक ही सीमित रह जाती है। वहीं ड्रॉपआउट दर (पढ़ाई बीच में छोड़ने की दर) सामान्य आबादी में जहां माध्यमिक स्तर पर लगभग 12–15 प्रतिशत है, वहीं घुमंतू और प्रवासी परिवारों में यह 40 प्रतिशत से भी अधिक पाई जाती है।
इनकी भूमि के पट्टे आज भी कागजों और अदालतों में उलझे हुए हैं। इस अस्थिरता के कारण लोग अपने घर, भविष्य और बच्चों की शिक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं हो पाते हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रवासी और घुमंतू परिवारों के लगभग 30 प्रतिशत बच्चों के पास बुनियादी पहचान के दस्तावेज नहीं होते, जिससे उनका स्कूल में नामांकन बाधित होता है। पलायन और घुमंतू समुदाय की सबसे बड़ी समस्या उनकी पहचान की होती है। स्थाई निवास नहीं होने के कारण, उनके बच्चों के पास जन्म प्रमाण पत्र, आधार या जाति प्रमाण पत्र नहीं होते, जिससे वे सरकारी योजनाओं और स्कूलों में प्रवेश से वंचित रह जाते हैं। बाबा रामदेव नगर बस्ती में भी यही स्थिति देखने को मिलती है, जिसकी वजह से यहां के अधिकतर बच्चों का स्कूल में दाखिला नहीं हो पाता। इसके अलावा, शिक्षा के ढांचे की कमी भी एक बड़ी समस्या है।
आर्थिक तंगी भी शिक्षा में एक बड़ी बाधा है। कई परिवारों के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना ही चुनौती है, ऐसे में बच्चों को स्कूल भेजना उनके लिए अतिरिक्त बोझ बन जाता है। बच्चों, खासकर लड़कियों, को घर के कामों और मजदूरी में लगना पड़ता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत में बाल मजदूरी की समस्या का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी और घुमंतू परिवारों से आता है, जहां लगभग 10 मिलियन बच्चे किसी न किसी रूप में काम कर रहे हैं। यह आंकड़ा बताता है कि शिक्षा और आजीविका के बीच बच्चों को अक्सर कठिन चुनाव करना पड़ता है।
कोविड-19 महामारी ने इस स्थिति को और खराब कर दिया। COVID-19 के दौरान स्कूल बंद हो गए और ऑनलाइन शिक्षा का विकल्प उन बच्चों के लिए लगभग असंभव था, जिनके पास न तो स्मार्टफोन थे और न ही इंटरनेट की सुविधा। वर्ल्ड बैंक के अनुसार महामारी के कारण भारत में लगभग 247 मिलियन बच्चों की शिक्षा प्रभावित हुई और इनमें से बड़ी संख्या प्रवासी और गरीब परिवारों की थी।
इस पूरी स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा पर कई स्तरों पर समस्याओं का पहरा है, जिनमें पहचान की कमी, आर्थिक तंगी, असुरक्षित माहौल, सामाजिक सोच और कमजोर शैक्षिक ढांचा प्रमुख है। इन समस्याओं का समाधान केवल स्कूल खोलने से नहीं होगा, बल्कि एक समग्र दृष्टिकोण की जरूरत है। (यह लेखिका के निजी विचार हैं)
