लधुकथा - कैसा मायका
डॉ. योगिता जोशी, शिक्षाविद् व साहित्यकार
सोनाली अपनी सहेली मीना से चहक-चहक कर बता रही थी कि मायके जाकर आई हूं। खूब मस्ती की, सैर सपाटे किए। रोज नए-नए व्यंजनों का आनंद लिया। सबसे अच्छा यह लगता था कि सुबह सबसे पहले नहीं उठना पड़ता था। मां पूरे दिन आगे-पीछे घूमती रहती थी। कभी बालों में तेल लगा देती, तो कभी अपना बक्सा खोलकर दिखाकर कहती, “जो तुझे चाहिए निकाल ले इसमें से”।
मीना चुपचाप खड़ी होकर सुन रही थी। सोनाली को अंदाजा नहीं था कि मीना की मां दो वर्ष पहले केंसर से हारकर भगवान को प्यारी हो गई है। इसलिए उसने बड़े उत्साह से पूछा, “तुम सुनाओ, तुम ने क्या मजे किए मायके में?” इतना सुनते ही मीना की आंखों से आंसू छलक पड़े। सोनाली के पूछने पर उसने कहा कि “मां बिन कैसा मायका? बेटी का मायका तब तक ही होता है, जब तक उसकी मां होती है।” इतना कहकर मीना फिर से रोने लगी। सोनाली ने उसके आंसू पोंछे और उसे गले से लगा लिया। आंसू सोनाली की आंखों में भी थे।
