Bareilly:देखे नहीं पढ़े जाते हैं फोटो...रघु राय ने कैमरे से सिखाया
बरेली, अमृत विचार। ज्यादा रघु राय मत बनो... यह महज एक जुमला नहीं था, बल्कि भारतीय फोटोग्राफी के उस शिखर पुरुष के प्रति आम आदमी का अनचाहा सम्मान था। उनका नाम ही इस फन की पहचान बन गया था। मशहूर फोटोग्राफर रघु राय के निधन की खबर से बरेली के फोटोग्राफी जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। रघु राय को करीब से जानने-समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार और छायाकारों ने अपने शब्दों में उनको याद किया है और उनके जाने पर गहरी पीड़ा बयां की है।
हम सबका इंप्रेशन एक होता था... सिर्फ रघु राय
वरिष्ठ पत्रकार प्रभात सिंह ने ''''अमृत विचार'''' से बातचीत में कहा कि अगर आप कैमरे वाले हैं, तो आपको उनसे मिलना ही चाहिए था। रघु राय के बड़े भाई भी फोटोग्राफर थे, जो खुद भी बहुत खूबसूरत काम कर रहे थे। लेकिन रघु राय का मतलब रघु राय थे। जिस दौर में हम लोग कैमरा लेकर काम करने आए थे, तब हर आदमी का इंप्रेशन एक ही होता था रघु राय। उस दौर में उनके साथ बहुत सारे लोग अच्छा काम कर रहे थे। लेकिन अपने डेडीकेशन ने उनको जो फेम दिया था, वो फेम भी लोगों को प्रभावित करता था। वर्ष 1986 में उनकी किताब ताजमहल आई। किताब की कीमत थी 800 रुपये और तब हम अखबार में पगार 700 रुपए पा रहे थे। घर से पैसे लेकर किताब ली थी पब्लिक सिनेमाई कलाकारों से प्रभावित होती रही मगर कैमरे वालों की पंसद रघु राय होते थे।
मानवीय संवेदनाओं के दुर्लभ दस्तावेजकार
वरिष्ठ छायाकार अतुल हुंडू ने कहा कि रघु राय मानवीय संवेदनाओं के दुर्लभ दस्तावेज़कार थे। एक फोटोग्राफर के रूप में उन्होंने मेरे दृष्टिकोण और सोच को गहराई से प्रभावित किया। उनकी तस्वीरों में केवल दृश्य नहीं, बल्कि समय, इतिहास और मानव जीवन की जटिल परतें जीवित दिखाई देती हैं। उनसे कई बार मिला। उनके व्याख्यान व कार्यशाला में भाग लिया। महाकुंभ में उन्हें कार्य करते हुए देखना अत्यंत प्रेरणादायक था। करोड़ों लोगों की भीड़, शोर और निरंतर गतिशीलता के बीच उनका शांत होकर क्षणों को देखना और उन्हें कैमरे में उतारना अद्भुत था। वे अक्सर कहते थे कि फोटोग्राफी केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि जीवन की धड़कनों को महसूस करने की कला है। मेरे निजी संग्रह में उनकी कुछ पुस्तकें भी हैं, जिन्हें मैं समय-समय पर देखता और पढ़ता हूं।
फोटो वहीं जो देखते ही मुंह से वाह निकले
वरिष्ठ छायाकार पंकज शर्मा ने कहा कि रघु राय फोटोग्राफी का अपना जीवन बनाकर जी रहे थे। प्रमाण उनकी तस्वीरों में भी साफ तौर पर देखा जा सकता था। कई बार हम उनके साथ एक ही लोकेशन पर फोटो ले रहे होते थे। लेकिन वो ऐसा फोटो अलग एंगल से खींच लेते थे, जिसको सब देखते ही रह जाते थे। उनका कहना था कि फोटो देखकर देखने वाले के मुंह से वाह न निकले, तो उस फोटो का कोई मतलब नहीं रह जाता। उन्हें उनके काम के लिए पदम श्री सम्मान मिला था। सम्मान मिलते समय पदम श्री और रघु राय एक-दूसरे के पर्याय लग रहे थे।
फोटोग्राफी जगत के लिए अपूर्णनीय क्षति
वरिष्ठ फोटो जर्नालिस्ट रोहित उमराव ने फोन पर कहा कि रघु राय का निधन फोटोग्राफी जगत की अपूर्णनीय क्षति है। रघु राय के चले जाने से अखबार का एक हिस्सा चला गया। कुंभ के समय उनके साथ काम करने का मौका मिला था। अन्ना हजारे के मूवमेंट के दौरान भी दिल्ली के रामलीला मैदान पर भी उनका साथ मिला था। उनकी फोटोग्राफी में आम आदमी के हाव भाव, शहरों की रौनक, गलियों की हलचल साफ नजर आती थी। किसान और मछुआरों के बारे में अपनी तस्वीरों के माध्यम से लोगों को काफी कुछ बताया था। उनके द्वारा कैद किया हुआ समय आज उनकी तस्वीरों के माध्यम से ठहर गया है।
