जॉब का पहला दिन : एक नई सोच को स्थापित करने वाला पहला कदम
जीवन में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो बिना किसी पूर्व सूचना के आ जाते हैं और आपने कभी सपने में भी नहीं सोचा होता है कि इसी राह पर आपका करियर बनेगा, पर नियति आपको उसी दिशा में मोड़ देती है, जिसके लिए आप बने हैं। बात उन दिनों की है जब मैं मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी कर नई दिल्ली में एक निजी कंपनी में अपना भविष्य टटोल रहा था।
एक कंपनी में 15 दिन की ट्रेनिंग के लिए मैं दिल्ली में ही था। संयोग देखिए - 11 सितंबर 2001, जिस दिन न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर दुनिया का सबसे भीषण आतंकी हमला हुआ, उसी दिन छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट से एक संदेश मिला: “आपका चयन मास्टर इन टूरिज्म मैनेजमेंट के पहले बैच में अतिथि शिक्षक के रूप में हो गया है।”
वही क्षण मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट बना, जब मैंने अकादमिक जगत में पहला कदम रखा। मन में हलचल थी, 25 साल की उम्र और सामने लगभग हमउम्र विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी, भीतर कहीं डर भी था, मगर पहली कक्षा के बाद संस्थान के वरिष्ठ शिक्षकों, खासकर निदेशक महोदय और वरिष्ठ प्रोफेसर ने जब कहा, “धीरे-धीरे सब परिपक्व होते हैं,” तो उन्हीं शब्दों ने मेरे भीतर नई ऊर्जा भर दी। -डॉ. सुधांशु राय, असिस्टेंट प्रोफेसर, कानपुर
नौकरी का पहला दिन था। पिताजी ने सहज भाव से कहा, “यह तो प्रोफेसर बन गया।” अगले दो दिन रिश्तेदारों के फोन आते रहे- सब यही दोहराते, “आपका बेटा प्रोफेसर हो गया।” किसी को यह एहसास ही नहीं था कि प्रोफेसर एक बड़ा पद होता है, जबकि मैं तो केवल पार्ट-टाइम गेस्ट फैकल्टी, यानी लेक्चरर के रूप में जुड़ा था। मैं जब स्वयं विद्यार्थी था, तभी से डायरी लिखने का शौक था। जब पुराने पन्ने पलटे तो कहीं नहीं लिखा था कि मुझे शिक्षक बनना है। मैं तो देश-शहर सुधारने के सपने देखता हुआ सिविल या डिफेंस सर्विस में जाना चाहता था। किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। बिना हिचक मैंने शिक्षण को अपनाया। पहले ही वर्ष संस्थान में पहचान बनने लगी और दो साल के भीतर मैं नियमित लेक्चरर के पद पर चुन लिया गया। जीवन अनिश्चितताओं और संघर्ष का ही दूसरा नाम है। मेरा जीवन भी उससे अलग नहीं था। इन्हीं संघर्षों ने मेरे व्यक्तित्व को तराशा, एक नई पहचान दी। वह दौर था जब कई युवा शिक्षक एक साथ आए थे, प्रतिस्पर्धा चरम पर थी। इन्हीं संघर्षों और मेरे शांत स्वभाव ने मुझे स्थायित्व दिया।
शुरुआत में लगता था कि सब पीछे खींचना चाहते हैं, पर वह केवल भ्रम था। पहले वर्ष से ही मैंने इसे स्वीकार कर अपने व्यक्तित्व को निखारना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे नए पड़ाव आते गए। अपने शुरुआती विचारों को साकार करने का अवसर मिला। विश्वविद्यालय के भीतर रचनात्मकता दिखाने का मौका मिला। विश्वविद्यालय में प्लेसमेंट सेल, काउंसलिंग सेल, होटल एवं टूरिज्म मैनेजमेंट विभाग की स्थापना और राष्ट्रीय सेवा योजना जैसे नए कॉन्सेप्ट स्थापित किए।
एनएसएस ने समाज के प्रति मेरा दृष्टिकोण व्यापक किया। एक नई विचारधारा जन्मी-शैक्षिक दायित्व के साथ-साथ समाज के प्रति भी हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है, इस सोच के साथ सामाजिक कार्यों में भागीदारी बढ़ी। कुछ ही वर्षों में पर्यटन, सामाजिक विकास और जन-जागरूकता जैसे विषयों पर पकड़ बनी। आज कानपुर शहर को केंद्र में रखकर हैप्पीनेस, स्वास्थ्य और विजन कानपुर पर काम हो रहा है।
“मुस्कुराए कानपुर”, “कानपुर हेल्थ कमेटी” और “कानपुर सुपर 100” जैसी संस्थाएं खड़ी कर शहर के हर क्षेत्र के प्रतिष्ठित नागरिकों को जोड़ते हुए “नव कानपुर, कुशल कानपुर” बनाने का प्रयास जारी है। सामाजिक दृष्टिकोण और प्रबंधन क्षमता के साथ जिला प्रशासन के साथ भी पर्यटन विकास और शहर के विकास में सलाहकार की भूमिका निभाकर आत्मिक संतुष्टि मिल रही है। हर इंसान के जीवन में अलग-अलग पड़ावों पर रोल मॉडल होते हैं। माता-पिता के बाद प्रारंभिक काल में एक सरकारी कार्यालय के अधीक्षक रोल मॉडल थे।
सेवा भाव से भरे हुए, आज कुलपति महोदय की प्रशासनिक क्षमता, कार्य के प्रति समर्पण और दूरदर्शिता मुझे प्रेरित करती है। आज जहां भी खड़ा हूं, अपने परिवार के समर्पण एवं सहयोग से। मैं मानता हूं कि मैंने सब कुछ नहीं पाया, पर काफी हद तक जीवन में संतुष्ट हूं खुश हूं। शैक्षिक दायित्व को पूरी निष्ठा से निभाते हुए समाज को नया नेतृत्व देने की कोशिश कर रहा हूं। ऐसा नेतृत्व जो अपने शहर कानपुर को “नया कानपुर, खुशहाल कानपुर” बनाने की दिशा में कुछ सार्थक कर सके।
