जनगणना-2027 : देर आयद दुरुस्त आयद

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Published By Deepak Mishra
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2021 में होने वाली जनगणना कोविड त्रासदी की भेंट चढ़ गई। यह प्रश्न जरूर है कि उसके बाद इस आवश्यक प्रक्रिया में इतनी देर क्यों कर दी गई।

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अनिल त्रिगुणायत, लखनऊ

 

विश्व की सर्वाधिक आबादी वाले देश भारत में जनगणना करीब पांच वर्ष की देरी के बाद अंतत: शुरू हो गई है। वर्ष 2021 में होने वाली जनगणना कोविड त्रासदी की भेंट चढ़ गई, लेकिन आम भारतीय में यह प्रश्न जरूर है कि केंद्र व राज्य सरकार की भारी-भरकम मशीनरी ने वास्तव में इस आवश्यक प्रक्रिया में इतनी देर क्यों कर दी? जब जनगणना प्रक्रिया को डिजिटल स्वरूप ही प्रदान करना था, तो दो-तीन वर्ष पूर्व क्यों नहीं की गई? इसका ठोस जवाब कदाचित संबंधित एजेंसी के पास भी नहीं है। 

समय पर जनगणना न होने से सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, संसाधनों के आवंटन व नीति-निर्माण में अनेकानेक बाधाएं आती हैं। तो यह मान लिया जाए कि विगत करीब पांच वर्ष तक केंद्र व राज्य की संदर्भित गतिविधियां स्मृति या कयास आधारित रहीं? उक्त दिनों में नीति-नियंताओं को योजना बनाने में कठिनाई हुई होगी, संसाधनों का त्रुटिपूर्ण आवंटन भी किया गया होगा, गरीब तबके को असमान संसाधन वितरण का सामना करना पड़ा होगा, निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन में दिक्कतें आई होंगी, स्वास्थ्य व आपातकालीन प्रबंधन भी प्रभावित हुआ होगा।

जनगणना किसी देश की जनसंख्या से संबंधित जानकारी एकत्र करने की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसमें देश के लोगों की संख्या, आयु, लिंग, शिक्षा, रोजगार, निवास स्थान आदि के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाती है। इसके माध्यम से सरकार को यह पता चलता है कि देश में कितने लोग रहते हैं, उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति कैसी है। इस जानकारी के आधार पर सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार और परिवहन जैसी योजनाएं बनाती है। यदि सही जनगणना न हो, तो सरकार को लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं का पता नहीं चल पाएगा। योजनाओं का लाभ लोगों तक सही ढंग से नहीं पहुंच सकेगा।

जनगणना से यह भी जानकारी होती है कि किसी क्षेत्र में जनसंख्या कितनी तेजी से बढ़ या घट रही है। इससे भविष्य के नियोजन में सहायता मिलती है। संसाधनों का सही वितरण करने में सहायता मिलती है। भारत में पहली आधुनिक जनगणना ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान वर्ष 1865 से 1872 तक आयोजित की गई थी, लेकिन यह देश के सभी क्षेत्रों में एक साथ नहीं हुई थी। पहली गैर-समकालिक जनगणना वर्ष 1872 में लॉर्ड मेयो (तत्कालीन वायसराय) के समय हुई थी। लार्ड रिपन के समय में भारत की पहली समन्वित जनगणना वर्ष 1881 में आयोजित की गई थी। वर्ष 1949 के बाद से गृह मंत्रालय के अधीन भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त द्वारा जनगणना कराई जाती है। 

जनगणना भारत के संविधान के अनुच्छेद 246 के अनुसार संघ का विषय है। संविधान की सातवीं अनुसूची के क्रम संख्या 69 में सूचीबद्ध है। आजाद भारत ने अपनी पहली जनगणना वर्ष 1951 में आयोजित की। सातवीं जनगणना वर्ष 2011 में कराई गई थी। वर्ष 2027 की जनगणना स्वतंत्रता के बाद से आठवीं जनगणना है। देश के 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों में होने वाली जनगणना में करीब सात हजार कस्बे तथा लगभग छह लाख 40 हजार गांव शामिल हैं। जनसांख्यिकीय, सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक आंकड़ों के संग्रह, संकलन, विश्लेषण तथा प्रसार की प्रक्रिया के माध्यम से अनेकानेक तथ्यात्मक सूचनाएं आधिकारिक रूप से प्राप्त की जाएंगी। 

देश में पहली बार डिजिटल माध्यम से की जाने वाली इस जनगणना में करीब तीन करोड़ कार्मिक स्मार्टफोन पर मोबाइल एप्लिकेशन जैसे डिजिटल उपकरणों का उपयोग करके आमजन से 33 प्रश्न पूछेंगे, आंकड़ा एकत्र करेंगे। व्यक्तियों के पास ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से स्वयं जनगणना करने का विकल्प भी होगा। 16वीं जनगणना की प्रक्रिया दो चरणों में पूरी की जाएगी। पहले चरण में मकानों की संख्या, उनकी स्थिति व उपलब्ध सुविधाओं का आंकड़ा एकत्र किया जाएगा, जबकि दूसरे चरण में वास्तविक जनसंख्या की गणना होगी। लाखों कर्मियों को इस कार्य के लिए तैनात किया गया है। 

अंतिम आंकड़े एक मार्च 2027 को घोषित हो जाएंगे। यह जनगणना न केवल आबादी का सही आंकड़ा देगी, बल्कि केंद्र व राज्य की विकास योजनाओं, संसाधनों के वितरण और नीतियों को आकार देने में भी मदद करेगी। पहले चरण में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के घरों का सर्वेक्षण होगा, जिसमें बिजली, पानी, शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की जानकारी ली जाएगी। दूसरे चरण में जनसंख्या गणना के दौरान प्रत्येक व्यक्ति का नाम, उम्र, लिंग, शिक्षा, रोजगार और प्रवास जैसे विवरण दर्ज किए जाएंगे। डिजिटल माध्यम से यह कार्य तेज और त्रुटिरहित होगा। कर्मियों को हैंडहेल्ड डिवाइस दिए जाएंगे, जिनमें जीपीएस की मदद से स्थान का पता चलेगा।  

अनाधिकारिक व अनौपचारिक जनगणना की बात करें तो भारत में इसका शुरुआती संदर्भ कौटिल्य के अर्थशास्त्र (321-296 ईसा पूर्व) में मिलता है। बाद के काल में सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान अबुल फजल की कृति 'आइन-ए-अकबरी' में भी इसका उल्लेख है। मौर्य प्रशासन में जनगणना तो एक नियमित प्रक्रिया थी। जेम्स प्रिंसेप द्वारा वर्ष 1824 में इलाहाबाद (प्रयागराज) व 1827-28 में बनारस (वाराणसी) में जनगणना की गई। किसी भारतीय शहर की पहली पूर्ण जनगणना वर्ष 1830 में हेनरी वाल्टर द्वारा ढाका में की गई थी। 

यूं तो 16वीं, किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत की आठवीं जनगणना का आधिकारिक वर्ष 2027 होगा। इसके लिए जमीनी कार्य का पहला चरण एक अप्रैल 2026 से शुरू होकर सितंबर 2026 तक चलेगा। अंतिम जनसंख्या गणना का काम फरवरी 2027 में पूरा होगा। जनगणना में हुई अभूतपूर्व देरी के लिए सरकारी निर्णय व प्रशासनिक मशीनरी उदासीन बनी रही, हालांकि इस देरी के पीछे कोरोना महामारी, लॉजिस्टिक व राजनीतिक कारक भी रहे। खैर, अति विलंब से ही सही, जनगणना शुरू कर केंद्र सरकार ने देर आयद दुरुस्त आयद के जुमले को चरितार्थ किया है।

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