जैव विविधता संरक्षण या पृथ्वी का शोकगीत
कल्पना कीजिए— एक तरफ मंच पर ‘प्रकृति संरक्षण’ पर भाषण चल रहा है। बच्चों के हाथों में पौधे हैं, पोस्टरों पर हरियाली बनी है और सरकारी घोषणाएं पृथ्वी को बचाने की प्रतिबद्धता दोहरा रही हैं। उसी समय कहीं किसी पहाड़ का सीना सड़क के लिए काटा जा रहा है। किसी नदी का स्वाभाविक प्रवाह मोड़ा जा रहा है। किसी जंगल के भीतर बुलडोज़र अगली परियोजना की रेखाएं खींच रहे हैं और किसी द्वीप के वर्षावन में विकास का नक्शा भविष्य की पारिस्थितिक चुप्पी लिख रहा है। यही हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
22 मई को दुनिया ‘अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस’ मनाएगी। यह दिन 1992 में हुए जैव विविधता अभिसमय की याद दिलाता है, लेकिन तीन दशक बाद यह स्पष्ट है कि जैव विविधता अब किसी हाशिए के पर्यावरणीय विषय की तरह नहीं देखी जा सकती। जलवायु परिवर्तन, खाद्य संकट, जल-संकट, सार्वजनिक स्वास्थ्य और विस्थापन— इन सभी के भीतर कहीं न कहीं जैव विविधता के क्षरण की छाया मौजूद है। प्रकृति के पक्ष में भाषा लगातार समृद्ध हुई है, पर प्रकृति के पक्ष में राजनीतिक इच्छाशक्ति उतनी ही क्षीण दिखती है।
‘जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति मंच के आकलनों के अनुसार विश्व की लगभग दस लाख प्रजातियां विलुप्ति के खतरे में हैं। धरती के जंगल सिकुड़े हैं, नदियां बदली हैं, समुद्र के भीतर तक मानवीय दखल बढ़ा है। अब पारिस्थितिक क्षति को त्रासदी की तरह नहीं, विकास की सामान्य कीमत की तरह पेश किया जाता है। संकट की सबसे असहज बात यह है कि जैव विविधता का विनाश आज शायद ही कभी खुले रूप में ‘प्रकृति-विरोध’ के नाम पर आता हो। वह ‘आधारभूत संरचना’, ‘रणनीतिक विकास’, ‘आर्थिक प्रगति’, ‘संपर्क विस्तार’ और ‘व्यापार सुगमता’ जैसी प्रशासनिक भाषाओं के भीतर छिपकर आता है।
भारत की स्थिति इस बहस को और जटिल बनाती है। भारत विश्व के 17 महा-जैव-विविध देशों में शामिल है। हिमालय से पश्चिमी घाट तक, सुंदरबन से निकोबार तक, यहां जैव विविधता केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, जल, आजीविका और सांस्कृतिक अस्तित्व का आधार है, इसलिए भारत में जैव विविधता संरक्षण कोई विलासिता का विषय नहीं, बल्कि पारिस्थितिक अस्तित्व का प्रश्न है। कागज़ों पर भारत के पास एक विस्तृत संस्थागत ढांचा भी मौजूद है। जैव विविधता एक्ट 2002 ने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड और जैव विविधता प्रबंधन समितियों जैसी व्यवस्थाएं निर्मित की हैं, लेकिन पर्यावरणीय कानूनों की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उनका अस्तित्व और उनका प्रभावी क्रियान्वयन प्रायः दो अलग-अलग वास्तविकताएं बन जाते हैं।
जैव विविधता दिवस का सबसे असुविधाजनक सच यहीं से आरंभ होता है— एक ओर संरक्षण और पुनर्स्थापन की भाषा है, दूसरी ओर वही विकास मॉडल है, जो जंगलों, पहाड़ों, तटीय पारितंत्रों और स्थानीय समुदायों पर लगातार दबाव बढ़ाता जा रहा है। अरावली श्रेणी इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। हाल के वर्षों में अरावली क्षेत्र पर खनन, भूमि उपयोग परिवर्तन, अवैध निर्माण और अतिक्रमण का दबाव निरंतर बढ़ा है। इसका प्रभाव केवल वनस्पतियों तक सीमित नहीं है; यह मिट्टी की स्थिरता, भूजल पुनर्भरण, वायु गुणवत्ता और पूरे उत्तर भारत के पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित करता है। अरावली केवल पहाड़ नहीं है। उत्तर भारत की हवा, धूल, तापमान और पानी के बीच वह एक चुप प्राकृतिक दीवार की तरह खड़ी रही है। (यह लेखक के निजी विचार हैं)
