जॉब का पहला दिन : फिर तो ऐसा लगा कि जन्नत मिल गई हो
सन् 1992 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमएससी रसायन शास्त्र अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहा था। समाचार पत्र में प्रक्रिया व उत्पाद विकास केन्द्र, कन्नौज में लैब तकनीशियन के तीन पदों का विज्ञापन देखा तो, अप्लाई कर दिया। इस बीच प्रोफेसर वीके वर्मा के निर्देशन में पीएचडी भी शुरू कर दी। नवंबर 1992 के अंतिम सप्ताह में एक पत्र कन्नौज से प्राप्त हुआ। प्रो. वीके वर्मा को दिखाया तो उन्होंने बधाई दी कि तुम्हारी तो नौकरी लग गई है, तुरंत जॉइन करो।
उस समय तो यह भी नहीं पता था कि कन्नौज है कहां? क्योंकि इंटरव्यू कानपुर में हुआ था। कानपुर से सुबह की ट्रेन से कन्नौज पहुंचे। वहां केन्द्र की शुरुआत ही हुई थी। मात्र दो इंडस्ट्रियल शेड थे, जिसमें केंद्र संचालित हो रहा था। विभिन्न आधुनिक मशीन और यंत्र आदि लगे थे, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा पोषित थे। कार्यालय में कम्प्यूटर व फोटोकापी मशीन भी थी। यह दोनों चीजें उस समय सर्व सुलभ नहीं थीं। ऐसे में जब डॉ. आलोक लहरी ने कहा कि यह सब अब तुम्हारे अंडर में है, तो मुझे लगा कि मेरी तो लॉटरी लग गई है। वर्ना तो कोई इन्हें छूने भी नहीं देता था। लैब में डॉ. लहरी ने स्टाफ से परिचय कराया कि यह मिस्टर पाल हैं और यह दिलदार, इनसे जो भी काम करवाना हो करवा लेना। इसी दौरान पाल ने पूछा कि साहब चाय बना लाएं, तो मन में लड्डू फूट पड़े कि हम साहब कब से हो गए? अभी तक तो स्टूडेंट्स थे। मात्र चंद घटों में सब कुछ बदल गया। अभी यह सोच ही रहे थे कि डॉ. लहरी बोले, लाओ अपने सारे डॉक्यूमेंट दो, जॉइनिंग पत्र बनवा देते हैं।
मालूम हुआ कि आज निदेशक डॉ. परमार्थी भी आए हैं और उन्हीं के समक्ष जॉइनिंग होगी। जब यह बताया कि हमें तो वाराणसी जाना है, सब ऐसे ही छोड़कर आ गए थे। परिवार में शादी भी है और सारा इंतजाम हमारे जिम्मे है। इस पर निदेशक डॉ. परमार्थी ने कहा कि यह नौकरी है, ऐसे नौकरी नहीं होती। बाकायदा एप्पलीकेशन दी जाती है उसके भी कुछ नियम-कानून है। ज्यादा से ज्यादा दो-तीन दिन की छुट्टी मिल सकती है। पहले काम समझ लो। इसी दौरान पता चला कि संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास कार्यक्रम के अंतर्गत परियोजना से जुड़े विशेषज्ञ शीघ्र आने वाले है। मशीनों की ट्रेनिंग के लिए टर्की जाना है। जल्दी से पासपोर्ट बनवाना है, फिर तो ऐसा लगा कि जन्नत मिल गई हो।
देश और विदेश में सुगंधित तेल से संबंधित प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद कन्नौज के इत्र उद्योग और इससे संबंधित उद्योगों की मदद के लिए कई सुगंधित तेलों का मानकीकरण किया। सन् 2003 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा युवा वैज्ञानिक पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके बाद प्रसार अधिकारी के रूप में कानपुर विस्तार इकाई में सन् 2004 में तैनाती मिली। 2015 में सहायक निदेशक व प्रभारी विस्तार इकाई कानपुर बनाया गया। इस तरह इस केंद्र में कार्य करते हुए 34 वर्ष हुए है।
