बुल मार्केट : सबसे ज्यादा फायदे में कौन

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Published By Deepak Mishra
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आम धारणा यह होती है कि बुल मार्केट में हर कोई पैसा कमाता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।

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रजत मेहरोत्रा, वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ


भारतीय शेयर बाजार पिछले कुछ वर्षों में लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। सेंसेक्स और निफ्टी रिकॉर्ड स्तरों पर पहुंच चुके हैं, करोड़ों नए डीमैट खाते खुले हैं और छोटे शहरों से लेकर गांवों तक लोग शेयर बाजार की चर्चा कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर हर दिन ‘मल्टीबैगर स्टॉक’, ‘एक साल में पैसा डबल’ और ‘फाइनेंशियल फ्रीडम’ जैसे शब्द तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, लेकिन इस तेजी के माहौल में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बुल मार्केट में सबसे ज्यादा पैसा कौन कमाता है—साधारण निवेशक, कंपनियां या फिर सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर्स?

बुल मार्केट यानी ऐसा दौर जब शेयर बाजार लगातार ऊपर की ओर बढ़ता है। इस दौरान निवेशकों का विश्वास मजबूत होता है, कंपनियों के शेयरों की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं और बाजार में निवेश का उत्साह चरम पर पहुंच जाता है। आम धारणा यह होती है कि बुल मार्केट में हर कोई पैसा कमाता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। सबसे पहले बात निवेशकों की करें तो बुल मार्केट उनके लिए अवसर जरूर लेकर आता है। लंबे समय तक धैर्य के साथ निवेश करने वाले निवेशकों को इस दौर में अच्छा लाभ मिलता है। SIP के माध्यम से निवेश करने वाले छोटे निवेशकों ने पिछले वर्षों में शानदार रिटर्न देखा है। 

कई लोगों ने पहली बार शेयर बाजार से कमाई का अनुभव किया है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है। सच्चाई यह है कि बुल मार्केट में सबसे अधिक लाभ वही निवेशक कमाते हैं, जिनके पास धैर्य, जानकारी और जोखिम को समझने की क्षमता होती है। अधिकांश छोटे निवेशक तेजी के अंतिम चरण में बाजार में प्रवेश करते हैं, जब शेयर पहले से काफी महंगे हो चुके होते हैं। ऐसे निवेशक अक्सर लालच और सोशल मीडिया के प्रभाव में बिना शोध के निवेश करते हैं और बाजार गिरने पर सबसे ज्यादा नुकसान उठाते हैं।

बुल मार्केट का दूसरा सबसे बड़ा लाभ कंपनियों को मिलता है। जब शेयर बाजार ऊंचाई पर होता है, तब कंपनियों के लिए पूंजी जुटाना आसान हो जाता है। IPO, FPO और QIP जैसे माध्यमों से कंपनियां बड़ी मात्रा में धन जुटाती हैं। ऊंचे वैल्यूएशन के कारण कंपनियों की बाजार पूंजी कई गुना बढ़ जाती है। इससे उन्हें विस्तार, अधिग्रहण और नए निवेश के अवसर मिलते हैं। कई बार कंपनियों के वास्तविक मुनाफे की तुलना में उनके शेयरों की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ जाती हैं, जिससे प्रमोटरों की संपत्ति में भारी इजाफा होता है।

भारत में पिछले कुछ वर्षों में कई कंपनियों के प्रमोटरों की नेटवर्थ केवल शेयर कीमतों में तेजी के कारण कई गुना बढ़ी है, लेकिन आज के बुल मार्केट की सबसे दिलचस्प और चिंताजनक भूमिका ‘इंफ्लूएंसर्स’ यानी फाइनेंशियल इंफ्लूएंसर्स की बन चुकी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने निवेश सलाह को एक नए व्यवसाय में बदल दिया है। यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स पर हजारों लोग खुद को बाजार विशेषज्ञ बताकर निवेश सलाह दे रहे हैं। बुल मार्केट में इन इंफ्लूएंसर्स की लोकप्रियता तेजी से बढ़ती है, क्योंकि तेजी के दौर में अधिकांश स्टॉक ऊपर जाते हैं और लोगों को लगता है कि हर सलाह सही साबित हो रही है।

आज कई इंफ्लूएंसर्स करोड़ों रुपये केवल व्यूज, विज्ञापन, पेड कोर्स, ब्रांड प्रमोशन और एफिलिएट मार्केटिंग से कमा रहे हैं। कुछ इंफ्लूएंसर्स ट्रेडिंग ऐप्स और ब्रोकिंग कंपनियों के साथ साझेदारी कर नए निवेशकों को जोड़ने का काम करते हैं। जितने अधिक लोग ट्रेडिंग करेंगे, उतना अधिक ब्रोकरेज और कमीशन उत्पन्न होगा। यही कारण है कि बुल मार्केट में निवेश को कई बार ‘सपनों की बिक्री’ की तरह प्रस्तुत किया जाता है। सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब निवेश शिक्षा और निवेश प्रलोभन के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है। 

सोशल मीडिया पर तेजी के दौर में जोखिम की चर्चा कम और मुनाफे की चर्चा ज्यादा होती है। ‘10 दिन में पैसा डबल’, ‘गारंटीड रिटर्न’ और ‘सीक्रेट स्टॉक’ जैसी बातें नए निवेशकों को आकर्षित करती हैं। कई युवा बिना वित्तीय समझ के केवल ट्रेंड देखकर निवेश करने लगते हैं। इससे निवेश के बजाय सट्टेबाजी की मानसिकता विकसित होने लगती है।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी SEBI ने हाल के वर्षों में इंफ्लूएंसर्स को लेकर चिंता भी जताई है। कई मामलों में पाया गया है कि कुछ इंफ्लूएंसर्स अपने निजी हितों के लिए स्टॉक्स को प्रमोट करते हैं। कुछ मामलों में ‘पंप एंड डंप’ जैसी गतिविधियां भी सामने आईं, जहां पहले किसी छोटे शेयर को प्रचार के जरिए ऊपर चढ़ाया गया और बाद में बड़े निवेशकों ने मुनाफा लेकर बाहर निकल गए, जबकि छोटे निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ा। (ये लेखक के निजी विचार हैं) 

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