घटते उर्वरक उत्पादन से अन्नदाता हलकान

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Published By Deepak Mishra
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ईरान पर अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमले का असर पूरी दुनिया में दिखने लगा है। आम भारतीय भी खतरे की घंटी को भांप रहा है, हमारे अन्नदाता भी चिंतित हैं डीजल और खाद को लेकर।

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अनिल त्रिगुणायत, लखनऊ 

 

ईरान पर अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमले का असर पूरी दुनिया में दिखने लगा है। युद्ध के कारण जहां कई देश ऊर्जा संकट से हलकान हैं, वहीं कुछ की आर्थिक दशा अधोगति को प्राप्त होते दिख रही है। इससे भारत भी अछूता नहीं है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संभाव्य आर्थिक परेशानी के बारे में अनवरत आगाह करते रहना, इस बात का द्योतक है कि संभाव्य समस्या दीर्घकालिक है। आम भारतीय खतरे की घंटी तो भांप ही रहा, हमारे अन्नदाता भी बेहद चिंतित नजर आ रहे हैं। उन्हें यह डर सताने लगा है कि फसलों की सिंचाई के लिए महंगे डीजल की व्यवस्था कैसे होगी? उर्वरकों का मूल्य क्या होगा? इसकी सुलभ उपलब्धता कैसे व किस प्रकार होगी? सरकार इसके लिए किस तरह का कदम उठाएगी? 

यूरिया उत्पादन में भारत आत्मनिर्भर नहीं है। यहां इसकी वार्षिक खपत करीब 440 लाख टन है, जबकि घरेलू स्तर पर इसका उत्पादन लगभग 300 से 315 लाख टन ही किया जाता है। करीब 100 लाख टन यूरिया का आयात चीन, ओमान, रूस, कतर और सऊदी अरब से किया जाता है। इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड (इफको) अपने पांच विनिर्माण संयंत्रों के माध्यम से 84 लाख टन, कृषक भारती सहकारी लिमिटेड (कृभको) अपनी दो विनिर्माण इकाइयों से 2.75 मीट्रिक टन, नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) अपनी पांच विनिर्माण इकाइयों के माध्यम से 3.62 मीट्रिक टन, राष्ट्रीय रसायन एवं उर्वरक लिमिटेड (आरसीएफ) दो विनिर्माण संयंत्रों से 2.3 मीट्रिक टन, चंबल फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड (सीएफसीएल) दो विनिर्माण यूनिट से 3.2 मीट्रिक टन, गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड (जीएसएफसी) अपनी तीन विनिर्माण इकाइयों से 2.38 मीट्रिक टन तथा कोरोमंडल इंटरनेशनल लिमिटेड अपनी चार विनिर्माण इकाइयों से 3.5 मीट्रिक टन यूरिया प्रति वर्ष उत्पादित करते हैं। 

बावजूद इसके, फसल सीजन में भारतीय किसान यूरिया की अनुपलब्धता, कालाबाजारी और असमान वितरण प्रणाली से से दो-चार होता ही रहता है। देश में इस वर्ष कुल यूरिया उत्पादन में करीब 24 प्रतिशत की कमी आई है। देश में संचालित अधिकांश संयंत्र तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) आधारित हैं। युद्ध के कारण इसकी आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। ऐसे में यूरिया की उत्पादकता पर दीर्घकालिक असर पड़ता तो दिख ही रहा, पहले से ही परेशान सीमांत किसानों की जेब पर प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है। 

होर्मुज जलडमरूमध्य में एलएनजी का भी आवागमन रोककर ईरान ने आग में घी डाल दिया। जब किसानों को पर्याप्त यूरिया नहीं मिलेगी तो फसलों की पैदावार-खासकर गेहूं, चावल और सब्जियों जैसे मुख्य भोजन की-कम हो सकती है। इससे बाजार में आपूर्ति कम होगी, खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ेंगी ही। परिणामस्वरूप रोजमर्रा के घरेलू खर्च बढ़ेंगे, परिवारों के बजट पर दबाव पड़ेगा, खासकर मध्यम और कम आय वाले समूहों के लिए। समय के साथ, यह स्थिति महंगाई, किसानों की आय में कमी और कुल मिलाकर आर्थिक तनाव का कारण बन सकती है, जिसका असर आखिरकार पूरे देश के आम घरों तक पहुंचेगा। 

भारत में कृषि जोत के आकार छोटे होते हैं। यहां अमेरिका, ब्राजील, अर्जेंटाइना व आस्ट्रेलिया की भांति बड़े-बड़े फार्म हाउस नहीं होते। भारत की 45 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर ही निर्भर है। मझोले व सीमांत किसान छोटे कृषि जोतों से अपना व परिजनों का जीवन निर्वहन करते हैं। यह सच है कि देश में खेती का रकबा बढ़ रहा, लेकिन अफसोस यह कि उर्वरक के उत्‍पादन में बड़ी गिरावट दिखने लगी है। वाणिज्‍य एवं उद्योग मंत्रालय के एक आंकड़े से पता चलता है कि भारत में उर्वरक उत्पादन इस वर्ष मार्च में पांच साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है।  

उर्वरक उत्पादन में सालभर पहले की तुलना में 24.6 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है। मार्च 2026 में उर्वरक उत्पादन सूचकांक 95.7 रहा, जो अप्रैल 2021 के बाद सबसे कम है। नई फसल सीजन में किसी तरह की बाधा न आए, इसके लिए भारतीय अर्थव्यवस्था को या तो सप्लाई चेन संकट में राहत चाहिए अथवा घरेलू उत्पादन में आई कमी की भरपाई के लिए उर्वरक आयात की जरूरत होगी। फिलहाल भारत अपनी कुल उर्वरक खपत का करीब 27 प्रतिशत आयात करता है। 

प्राकृतिक गैस उर्वरक संयंत्रों के लिए ईंधन और कच्चा माल दोनों है। वैश्विक ऊर्जा संकट को देखते हुए उर्वरक संयंत्रों के लिए प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में अस्थायी 30 प्रतिशत कटौती की बात सामने आ रही है। वहीं, उर्वरक उत्‍पादन में करीब 25 फीसदी की कटौती किए जाने की बात हो रही है। निहितार्थ यह कि बाजार में इसकी आपूर्ति तो प्रभावित होगी ही, किल्‍लत या फिर इसकी कीमतों में बढ़ोतरी किसानों को बेचैन करेगी। यह सच है कि सरकार किसानों के हितों की रक्षा के सारे जतन कर रही है। वह सब्सिडी के माध्यम से इसकी कीमत नियंत्रित करने की भी कोशिश कर रही है, लेकिन इससे वित्तीय बोझ बढ़ रहा है। 

इस वर्ष यूरिया सब्सिडी बिल करीब दो लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। एलएनजी से संचालित होने वाले उर्वरक संयंत्रों को यदि यूरिया/एनपीके का प्रचुर उत्पादन करना है, तो उन्हें आत्मनिर्भर बनना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा से ग्रीन हाइड्रोजन बनाकर आयातित गैस पर निर्भरता घटाई जा सकती है। सोलर पंप, इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर और सोलर या बायोमास से चलने वाली कोल्ड चेन से खेती सुरक्षित हो सकती है। 

देश में खाद्यान्न (अनाज और दलहन) का कुल उत्पादन करीब 357.73 मिलियन मीट्रिक टन होता है। इसमें करीब 150.18 मिलियन मीट्रिक टन धान (चावल), लगभग 117.94 मिलियन मीट्रिक टन गेहूं, लगभग 63.92 मिलियन मीट्रिक टन मोटे अनाज तथा 25.68 मिलियन मीट्रिक टन दालें शामिल हैं। यह सच है कि खाद्यान्न उत्पादन में हमने आशातीत सफलता पाई है, लेकिन आसन्न उर्वरक संकट से पार पाने के लिए हमें समय रहते ठोस कदम उठाना ही होगा।

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