1857 की क्रांति का गौरवशाली केंद्र बरेली: खान बहादुर खान से दामोदर स्वरूप तक के शहीद
रमेश चंद्र, वरिष्ठ पत्रकार: यह विद्रोह नहीं, बल्कि बरेली की धरती पर रह रहे उन भारतीयों के दिलों की आवाज थी, जिन्होंने यह ठान लिया था कि ब्रिटेन के जुल्म ढा रहे ‘गोरों’ को देश से खदेड़ भगाना है। उनका जुल्म अब नहीं सहना है। आखिरकार इस जुनून के साथ अंग्रेजों से भिड़कर ये क्रांतिकारी शहीद हो गए। इस बात का ध्यान करते हुए कि भविष्य में आने वाली पीढ़ी जरूर इस भारत को आजादी दिलाएगी और हुआ भी यही। इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की बदौलत वर्ष 1947 में हमारा देश आजाद हुआ। देश भर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ बरेली के ये स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों से टक्कर में पीछे नहीं रहे, बल्कि आगे बढ़-चढ़कर भागीदारी की।
बरेली के मंडलायुक्त कार्यालय परिसर में लगभग सवा सौ साल पुराना बरगद का वह पेड़ आज भी मौजूद है, जो बरेली के उन शहीदों की याद दिला रहा है। जुल्म का विरोध करने पर बरेली के क्रांतिकारियों को इसी पेड़ पर फांसी पर लटका दिया था। यह ऐतिहासिक बरगद अब 1857 की क्रांति का मूक गवाह है, जो वर्तमान पीढ़ी को जुल्म के खिलाफ खड़े होने का संदेश भी दे रहा है। स्वतंत्रता दिवस का दिन 15 अगस्त हो या फिर 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस। आजादी दिलाने में शहीद हुए इन वीरों को यहां के लोग श्रद्धांजलि देने आते हैं। सौ वर्ष से ज्यादा पुराने पेड़ों को सहेज कर रखने की राज्य सरकार की नीति के तहत इस पुराने पेड़ को भी संरक्षित किया गया है।
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ये थे बरेली के प्रमुख क्रांतिकारी
बरेली में आजादी की लड़ाई के और भी विरासत मौजूद हैं, जो यहां के लोगों को उस समय की याद दिलाते हैं। यहां के क्रांतिकारियों में खान बहादुर खान रोहिल्ला, दामोदर स्वरूप सेठ, पृथ्वी राज सिंह व जनरल बख्त खान प्रमुख हैं। इन्होंने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया था। जनरल बख्त खान दिल्ली में विद्रोही सेना के कमांडर-इन-चीफ थे। पहले वह ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना (आर्टिलरी) में बतौर सूबेदार कार्य किया था। बाद में इसे छोड़कर वे बरेली से क्रांतिकारियों का नेतृत्व करते हुए दिल्ली पहुंचे थे।
बांस बरेली के सरदार थे दामोदर
बरेली के सेठ दामोदर स्वरूप पंडित राम प्रसाद बिस्मिल से लेकर चन्द्रशेखर आजाद तक के क्रांतिकारी आंदोलनों में शामिल रहे। यही वजह थी कि वर्ष 1930 में बरेली की गलियों में एक ही नारा गूंजता था-‘बांस बरेली का सरदार, सेठ दामोदर जिंदाबाद।’ दामोदर के पास 21 फरवरी 1915 के विद्रोह की जिम्मेदारी थी। 1857 की तरह तख्ता पलट की योजना थी, पर इसका भंडाफोड़ होने के बाद उन्हें सात साल की सजा हुई। बेड़ियां पहनकर पूरा समय काल कोठरी में बिताया। काकोरी के निकट नौ अगस्त 1925 में पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 10 क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना लूट लिया, जिसके बाद सेठजी को गिरफ्तार कर लिया गया और 18 महीने तक मुकदमा चलने के दौरान उनको जेल में रखा गया। 1930 से कांग्रेस से जुड़कर 1942 तक कई बार जेल यात्राएं कीं।
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चुन्ना मियां ने पेश की थी हिंदू-मुस्लिम एकता का उदाहरण
सेठ फजलुर्रहमान (चुन्ना मियां) ने बरेली में लक्ष्मी नारायण मंदिर बनवाकर हिंदू-मुस्लिम एकता का उदाहरण पेश किया था। बरेली में सेठ फजलुर्रहमान उर्फ चुन्ना मियां ने अमन और सौहार्द का पैगाम देने के लिए शहर के कटरा मानराय में वर्ष 1960 में लक्ष्मी नारायण का मंदिर स्थापित किया था। उन्होंने मंदिर को जमीन देने के साथ ही इस निर्माण खुद कराया। चुन्ना मियां के मंदिर का उद्घाटन 16 मई 1960 को देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने किया था।
विद्रोह के जरिए खान बहादुर खान ने स्थापित की थी स्वतंत्र सत्ता
खान बहादुर खान रोहिल्ला ने विद्रोह के जरिए यहां एक स्वतंत्र सरकार स्थापित की थी। यह वह नाम था, जिसे सुनकर अंग्रेजों की रूह कांप जाया करती थी। उन्होंने कई अंग्रेजी अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया था। अंग्रेजों को खदेड़कर 31 मई 1857 को रोहिलखंड को मुक्त कराया था और अंग्रेजी हुकूमत के समय बरेली में 10 महीने पांच दिन तक समानांतर सरकार चलाई थी। उन्होंने अन्य क्रांतिकारी शोभा राम को वजीरे आजम घोषित किया था। पर अंग्रेजों ने फिर से बरेली पर कब्जा कर लिया था। 24 फरवरी 1860 को बरेली की पुरानी कोतवाली में इन्हें फांसी दी गई थी, जबकि अन्य 257 क्रांतिकारियों को मंडलायुक्त कार्यालय परिसर में बरगद के पेड़ पर फांसी दी गई। आज यहां पर अमर शहीद स्तंभ मौजूद हैं। यह स्मारक आज भी शहीदों के संघर्ष व बलिदान को जीवंत बनाए हुए है। खान बहादुर खान रूहेलखंड के द्वितीय नवाब हाफिज रहमत खान के पौत्र थे। वह रोहेला शासकों के वंशज थे। जनता में उनका सम्मान व प्रभाव था। यही वजह थी कि उन्होंने क्रांति के लिए विद्रोह का नेतृत्व किया।
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फरीदपुर का बुधौली गांव था क्रांतिकारियों की शरण स्थली
बरेली के फरीदपुर का बुधौली गांव क्रांतिकारियों की शरण स्थली बन गया था। महात्मा गांधी के अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन के आह्वान पर इस गांव के निवासी पृथ्वीराज सिंह ने अंग्रेजों से लोहा ले लिया था। उनके साथ इस गांव के सभी लोग खड़े थे। जब इसकी जानकारी अंग्रेजों को हुई, तो उनकी सेना ने इस गांव को चारो ओर से घेर लिया, पर यह घेराबंदी गांव के लोगों के हौंसले को तोड़ नहीं पाई थी। पृथ्वीराज की पत्नी शीला देवी महिला कांग्रेस की कमांडर थीं। ब्रिटिश हुकूमत ने पति-पत्नी को नजरबंद कर दिया था। पर इससे रिहाई के बाद उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अपना विद्रोह जारी रखा।
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398 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने किया सर्वस्व न्यौछावर
बरेली के 398 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने भारत की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। ये वे दीवाने थे, जिन्होंने न केवल अंग्रेजों से लोहा लिया, बल्कि देश की आजादी के बाद बरेली के पुनर्निर्माण में भी अहम भूमिका निभाई। जिला प्रशासन के रिकॉर्ड में 398 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का इतिहास दर्ज है, जिन्होंने विभिन्न आंदोलनों में भाग लिया और लंबे समय तक जेल में समय बिताया।
सेनानी बने थे राजनेता
इन 398 सेनानियों में से 20 से अधिक ऐसे थे, जिन्होंने बाद में लोकसभा, विधानसभा, जिला परिषद और नगर पालिका बरेली के चेयरमैन/सदस्य के रूप में काम किया और बरेली की समृद्धि में योगदान दिया। यह 398 का आंकड़ा सरकारी रिकॉर्ड पर आधारित है, जबकि कई गुमनाम सेनानियों ने भी इस लड़ाई में अपना योगदान दिया था।
जान बचाकर नैनीताल भाग गए थे अंग्रेजी अफसर
31 मई 1857 को बरेली के क्रांतिकारियों ने विद्रोह किया, तो अंग्रेजी अफसर जान बचाकर नैनीताल भाग गए थे। 7 मई 1858 को अंग्रेजी अफसरों ने फिर से बरेली पर कब्जा कर लिया था। इसी के बाद 257 क्रांतिकारियों को फांसी पर लटकाया गया था। अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए प्रशासन और सख्त कर दिया था। फिर भी बरेली के लोगों ने लंबे समय तक संघर्ष जारी रखा था। यह दर्शाता है कि बरेली के लोगों ने केवल विद्रोह नहीं, बल्कि एक संगठित शासन की कोशिश की थी।
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1936 को हुआ था कांग्रेस का सम्मेलन
वर्ष 1936 में बरेली में कांग्रेस का सम्मेलन हुआ था। इसकी अध्यक्षता आचार्य नरेंद्र देव ने की थी। जवाहर लाल नेहरू, एमएन राय और रफी अहमद किदवई जैसे नेता इस सम्मेलन में शामिल हुए थे।
आजादी के लिए लड़ने वाला साहसी केंद्र
बरेली केवल ऐतिहासिक व व्यापारिक केंद्र नहीं, बल्कि आजादी के लिए लड़ने वाला साहसी केंद्र था। यहां के लोगों ने अपने अधिकारों व स्वतंत्रता के लिए, जो बलिदान दिया, वह आज भी इतिहास में अमर है। 1857 का स्वतंत्रता संग्राम बरेली के इतिहास का गौरवशाली अध्याय है।
ऐसे हुई थी बरेली में विद्रोह की शुरुआत
बरेली में विद्रोह अचानक नहीं थी, बल्कि कई कारणों से बरेली समेत पूरे उत्तर भारत में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा था। वजह यह थी कि धार्मिक व सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप हो रहा था। अत्यधिक कर व आर्थिक शोषण हो रहा था। भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव हो रहा था। इन सभी कारणों ने 1857 के विद्रोह की नींव तैयार की थी। मेरठ से शुरू हुई क्रांति बरेली भी पहुंच गई।
बरेली के सेंट्रल जेल में बंद हुए थे सेनानी
बरेली की ऐतिहासिक सेंट्रल जेल (केंद्रीय कारागार) 1848 में स्थापित हुई थी और यहां स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों की बंदी स्थली रही है। पंडित जवाहर लाल नेहरू को 31 मार्च 1945 को अहमदनगर फोर्ट जेल से बरेली सेंट्रल जेल में शिफ्ट किया गया था। वह यहां लगभग 6 महीने (10 जून 1945 तक) बंद रहे थे। जेल के दस्तावेजों में वे कैदी नंबर 582 के रूप में दर्ज थे। जिस बैरक में नेहरू जी को रखा गया था, उसे अब ‘नेहरू बैरक’ के नाम से जाना जाता है और उस जगह का संरक्षण किया जाता है। स्वतंत्रता सेनानी और प्रमुख समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव भी पंडित नेहरू के साथ बरेली जेल में बंद थे। उनका नाम कैदी नंबर 583 के रूप में दर्ज था। बरेली सेंट्रल जेल में काकोरी ट्रेन एक्शन (काकोरी कांड) के क्रांतिकारियों को भी कैद करके रखा गया था। नेहरू के साथ-साथ इस जेल में कुल 592 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को कैद किया गया था। इस जेल में बंद कैदियों के लिए ‘नेहरू बैरक’ एक प्रेरणा का केंद्र है।
पुराने बरेली कॉलेज में बनी थी विद्रोह की योजना
ब्रिटिश हुकूमत ने 1837 में देश में चार कॉलेज मुम्बई, कोलकाता, अजमेर व बरेली में खोले थे। इसी बरेली कॉलेज के छात्रों ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजा दिया था। कॉलेज के छात्रों ने कॉलेज के प्रिंसपल डॉ. कारलोस बक को मौत के घाट उतार दिया था। छात्रों ने 110 दिन की हड़ताल की, पर कॉलेज के सीनियर छात्रों ने जूनियर छात्रों को जुबली पार्क में पढ़ाया था और आजादी के लिए आंदोलन जारी रखा। बाद में इसी आंदोलन की बागडोर रुहेला सरदार खान बहादुर खान ने संभाल ली थी।
