कहानीः खुशियों के हत्यारे... अनवर कभी नहीं लौटेगा शाजिया की टूट गई दुनिया

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Published By Muskan Dixit
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लखनऊः शौहर के बिना छोटे-छोटे बच्चों को लेकर एक सुंदर और जवान औरत के अकेले रहने में होंने वाली मुश्किलों के बारे में तो कोई शाजिया से पूछे। बेचारी शाजिया पिछले पांच सालों से सिकंदरपुर में अकेले ही रह रही है। उसका शौहर अनवर साल-दो साल में मुश्किल से एक बार परदेस से वापस सिकंदरपुर आ पाता है। मगर जब वह आता है, तो शाजिया के लिए ढेरों कपड़े, गहने, प्रसाधन का सामान आदि लाता है। इसके अतिरिक्त अपने बच्चों के लिए खूब बढ़िया डिजाइन के कपड़े और बैटरी -चालित खिलौने लेकर आता है। उन दिनों शाजिया और उसके छोटे-छोटे बच्चों की खुशी देखने लायक होती है। ऐसा लगता है मानो जमाने भर की खुशियां शाजिया के आंगन में इकट्ठा हो गई हैं।

अनवर एक-डेढ़ महीना अपने परिवार के साथ गुजारकर धन कमाने के लिए वापस परदेस लौट जाता है। उसे विदा करते समय शाजिया और उसके बच्चों का दुख हृदय विदारक होता है। अनवर के आने के बाद से ही शाजिया सुबह उठते और रात को अनवर के साथ सोते समय अनवर के साथ जीने के लिए बचे हुए दिन गिनना शुरू कर देती है और जब यह संख्या सिमट कर एक अंक में आ जाती है, तो शाजिया की आंखें बगावत पर उतर आती हैं और आंसुओं से शाजिया के गालों को तर-ब-तर करने लगती हैं। उसका फूल-सा चेहरा कुम्हलाने लगता है। वह अक्सर अपनी बेटी सलमा और बेटे साजिद को भी बताने लगती है कि अब तुम्हारे अब्बू के परदेस जाने में कुल इतने दिन शेष बचे हैं। पता नहीं अपने मासूम बच्चों को यह बताकर वह उन्हें उनके अब्बू से निकट भविष्य में होने वाली जुदाई के प्रति आगाह करती है अथवा अपना दु:ख कम करने के लिए वह ऐसा करती है।

अनवर के परदेस जाते ही गांव के कई मनचले शाजिया से हमदर्दी दिखाने और उससे रिश्ता जोड़कर नजदीक आने का प्रयास करने लगते हैं। मगर शाजिया उनकी बदनीयती को भली-भांति समझती है और इसीलिए उन्हें किसी प्रकार की मदद लेना तो दूर, उनको अपने पास तक नहीं फटकने देती है। 

शाजिया से निकाह के बाद पहली बार जब अनवर रोजी-रोटी के चक्कर में अपनी नवविवाहिता खूबसूरत पत्नी को अपनी बूढ़ी मां के सहारे छोड़ कर परदेस गया था, तो शाजिया प्रेगनेंट थी। इस हालत में शाजिया को छोड़कर जाने का उसका मन तो नहीं था, परंतु मजबूरी में उसे जाना ही पड़ा। पैतृक संपत्ति के नाम पर कुल दो बीघा खेत ही उसके पास था, जिसे गिरवीं रखकर उसने कैंसर से जूझ रहे अपने अब्बा का इलाज कराया था, फिर भी उनको मौत से बचा नहीं सका था। गांव में एक दिन काम मिलता तो दो-दिन खाली बैठना पड़ता। ऐसी विकट परिस्थिति में अनवर के खालू ने उसे अपने साथ परदेस चलकर कमाने का प्रस्ताव दिया था और किराए की रकम भी कर्ज के रूप में देने का प्रस्ताव दिया था, जिसे अनवर ठुकरा नहीं सका और शाजिया को रोता-बिलखता छोड़कर अपने खालू के साथ परदेस कमाने चला गया था।

अनवर परदेस में रहकर नियमित रूप से हर महीने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा घर भेजता रहा। उसने अपनी मां और शाजिया दोनों को हिदायत दी थी कि रुपये संभालकर खर्च करें और कुछ रुपये हर महीने बचाकर रखें ताकि जल्दी से जल्दी  अपना खेत साहूकार से वापस लिया जा सके। इस बीच उसे खबर मिली कि शाजिया ने बेटी को जन्म दिया है, तो उसका मन अपनी औलाद को देखने के लिए तड़प उठा। मगर सिकंदरपुर जाने के लिए किराए में खर्च होने वाली बड़ी रकम का ध्यान करके उसने अपना सिकंदरपुर जाना मुल्तवी कर दिया और टेलीफोन पर अपनी अम्मी से बेटी के रंग-रूप के विषय में जानकारी हासिल करके तसल्ली कर ली। उसने अपनी अम्मी से कहा कि शाजिया अगर राजी हो तो बेटी का नाम सलमा रखना।

यह सुनकर अनवर की अम्मी बोली -“नाम तो बहुत अच्छा सोचा तुमने। शाजिया को भी इंशाअल्लाह यह नाम पसंद आएगा।”

फिर कुछ रुककर वह बोलीं- “ मगर यह तो बता कि तेरी बेटी अब्बू-अब्बू कहकर जो गला फाड़ती है, उससे क्या कहूं?”
यह सुनकर अनवर की आंखें छलछला आईं और उसने कांपती आवाज में जवाब दिया -“अल्लाह ने चाहा तो जल्दी ही आऊंगा अम्मी।” फिर टेलीफोन काट दिया। 

दो महीने बाद ही अनवर को अपनी मां के इंतकाल की खबर शाजिया से मिली मगर यह खबर सुनकर भी उसे किराये की रकम जोड़कर वापस लौटने में एक साल लग गया। इसके बाद जब अनवर एक महीने के बाद वापस परदेस के लिए निकला तो एक और संतान का बीज बो गया था। शाजिया ने हिम्मत करके अकेले ही अपना समय काटा और गर्भ का समय पूर्ण होने पर अपने मायके वालों की मदद से बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम अनवर ने साजिद रखा था।

शाजिया ने घर खर्च में कटौती करके धीरे-धीरे इतनी रकम जोड़ ली थी कि साहूकार के पास गिरवी रखा अपना खेत छुड़ा सके और अनवर के परदेस से लौटते ही उसने अपना खेत वापस छुड़ा लिया।

शाजिया ने अनवर को इस बात के लिए राजी करने की भरपूर कोशिश की कि अब अनवर कमाने के लिए परदेश न जाए और यहीं रहकर अपना खेत संभाले और खाली समय में कोई और काम-धंधा पकड़ लें। मगर अनवर शाजिया को यह समझाकर वापस परदेस चला गया कि एक-दो साल परदेस में रहकर कुछ रकम और बचा ले ताकि उस रकम से यहां आकर कोई दुकान खोल सके। इसके बाद वह कभी परदेस नहीं जाएगा।

अनवर के जाने के बाद शाजिया ने महसूस किया कि उसके पांव फिर भारी हो गए हैं। उसने यह सूचना फोन करके अनवर को दी और जल्दी से जल्दी वापस लौटने का आग्रह किया।

इसके कुछ दिन बाद ही उसने सुना कि जिस इलाके में अनवर कमाने गया है, वहां लड़ाई शुरू हो गई है। शाजिया ने घबड़ाकर अनवर को फोन लगाया मगर उससे संपर्क नहीं हो सका। वह परेशान हो गई। अनवर का हाल-चाल न मिलने के कारण उसको एक एक दिन काटना मुश्किल हो गया। इधर उसके बैंक खाते में रुपये भी नहीं आए। इससे उसकी चिंता और भी बढ़ गई।

अचानक एक दिन उसे सरकारी कर्मचारियों से खबर मिली कि तेल रिफाइनरी पर मिसाइल गिरने से रिफाइनरी में आग लग गई, जिसमें अनवर सहित तीन भारतीय कामगारों की मृत्यु हो गई है। वहां स्थित भारतीय दूतावास उनके मृत शरीर वापस भारत लाने का प्रयास कर रहा है।

यह सुनकर शाजिया बेहोश हो गई। गांव के लोग यह समाचार सुनकर अनवर के दरवाजे पर इकट्ठा होने लगे। वे सब आपस में बातें कर रहे थे कि युद्ध तो ईरान और इजरायल में हो रहा है तथा अमेरिका इजरायल की मदद कर रहा है। यूएई में तो कोई युद्ध नहीं हो रहा है, फिर वहां पर मिसाइल से हमला क्यों? वहां मौजूद सभी लोगों अपने अपने ढंग से ट्रंप, नेतन्याहू और मुज्तबा खामेनेई को कोस रहे थे और देश में हो रही डीजल, पेट्रोल और रसोई गैस की किल्लत तथा बढ़ती मंहगाई को लेकर इन नेताओं को जिम्मेदार ठहरा रहे थे। सबकी जुबान पर एक ही बात थी कि ये सब हत्यारे हैं। इन्होंने दुनियाभर में रह रहे गरीबों की जिंदगी में मंहगाई का जहर घोल दिया है।

किशोर वय के बच्चे जो इन लोगों का वार्तालाप सुन रहे थे, उन्होंने कुछ दूर हटकर समवेत स्वर में चिल्लाना शुरू कर दिया:- साजिद, सलमा के अब्बू हो गए खुदा को प्यारे हैं। नेतेन्याहू ट्रंप मुज्तबा सब उनके हत्यारे हैं।। काश उनकी आवाज इन अहंकार में डूबे नेताओं तक पहुंच पाती।

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