छोटा हूं, पर समझ रखता हूं-मेरी बात भी सुनी जाए

Amrit Vichar Network
Published By Muskan Dixit
On

मेघा राठी(भोपाल): भारतीय समाज की संरचना में ‘छोटा’ कहलाना एक सामान्य बात है-चाहे वह सबसे छोटा बेटा हो, नई बहू हो या फिर परिवार में हाल ही में जुड़ा कोई सदस्य। यह शब्द उम्र या अनुभव का परिचायक भर नहीं रहता, बल्कि कई बार इसका अर्थ बन जाता है - कम समझदार, कम अधिकार रखने वाला या किसी निर्णय में भागीदार न समझा जाने वाला व्यक्ति।

“तुम छोटे हो, तुम्हें नहीं समझ आएगा”-क्या यह वाक्य निष्पक्ष है? समाज में अनेक बार ऐसे वाक्य सुनने को मिलते हैं- “बड़े लोग फैसला करेंगे।” “तुम्हारा अनुभव नहीं है, चुप रहो।” “जैसा कहा जाए, वैसा करो।” इन पंक्तियों के पीछे छिपा नजरिया न केवल किसी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता और संवेदनाओं की अवहेलना करता है, बल्कि उसके आत्मविश्वास को भी आघात पहुंचाता है। जब ‘छोटे’ की बातों ने बड़ा असर डाला।

नई बहू का सजग सुझाव परिवार में नई बहू ने वृद्ध माता-पिता के लिए घर में एक शांत कोना बनाने का विचार साझा किया, जिससे उन्हें मानसिक सुकून मिल सके, लेकिन उसे यह कहकर टाल दिया गया-“तुम नई हो, इतना मत सोचो।” महीनों बाद, जब माता-पिता मानसिक तनाव से गुजरे, तब वही सुझाव अमल में लाया गया।

छोटे भाई की डिजिटल दृष्टि- एक छोटे भाई ने पारंपरिक पारिवारिक व्यवसाय को डिजिटल माध्यम पर लाने की बात कही। प्रारंभ में उसकी बात को हल्के में लिया गया, परंतु जब व्यापार में गिरावट आई और उसी सुझाव को अपनाया गया, तब व्यवसाय ने नई ऊंचाइयां छू लीं।

बेटी की निश्छल संवेदना- माता-पिता के झगड़ों के बीच एक छोटी उम्र की बेटी ने मां से सहजता से पूछा, “क्या आपने पापा से खुलकर बात की?” -यह प्रश्न रिश्तों की गुत्थी को खोलने की कुंजी बन गया।

सबसे छोटे बेटे की संकल्पशक्ति- जब परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा था और सभी प्रयास निष्फल हो चुके थे, तब सबसे छोटे बेटे ने फ्रीलांसिंग से आय बढ़ाने का सुझाव दिया। उसका विश्वास और नई सोच परिवार को संकट से निकाल लाई।

छोटा होना क्या नहीं होता

यह कम समझदारी का प्रमाण नहीं होता।

यह कम भावनात्मक गहराई का संकेत नहीं होता।

यह कम अधिकार या सम्मान का कारण नहीं होता।

‘छोटा’ व्यक्ति नई दृष्टि, संवेदना और निर्भीक विचारों के साथ परिवार को ऐसा मार्ग दिखा सकता है, जो अनुभवों की गठरी से भरे बड़े भी कभी-कभी नहीं देख पाते।

बड़ों की भूमिका- मार्गदर्शक, न कि निर्णायक मात्र
सुनिए, टालिए नहीं-छोटों की बातों को सिर्फ उम्र या अनुभव से कमतर न आंकें।

मार्गदर्शन दीजिए, नियंत्रण नहीं- सहयोग करें, पर निर्णय लेने का अवसर भी दें।

साझेदारी बढ़ाइए- ऐसा वातावरण बनाइए, जहां हर सदस्य अपनी बात निडरता से कह सके।


परिवार का सौंदर्य तभी पूर्ण होता है, जब हर सदस्य -चाहे वह कितना भी ‘छोटा’ क्यों न हो-सुना जाए, समझा जाए और सम्मानित किया जाए। छोटा होना किसी भी दृष्टि से कमजोरी नहीं, बल्कि नई ऊर्जा, नए विचार और निर्मल भावनाओं का प्रतीक है। आइए, छोटों को केवल पालन-पोषण का विषय न मानें -उन्हें सम्मान, संवाद और विश्वास का भी समान अधिकार दें।

संबंधित समाचार

टॉप न्यूज