लखनऊ : हाईकोर्ट ने खारिज की पूर्व विधायकों के पेंशन-भत्तों को चुनौती देने वाली याचिका
लखनऊ। इलाहाबाद उच्च न्यायलय की लखनऊ पीठ ने पूर्व विधायकों (विधान सभा और विधानपरिषद के सदस्य) को पेंशन, पारिवारिक पेंशन और अन्य सुविधाएं देने वाले कानूनी प्रावधानों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी की पीठ ने कहा कि पेंशन और संबंधित लाभ विधायी अधिकार क्षेत्र का मामला है।
नीतिगत मतभेद के आधार पर इन्हें असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान विधायिका को अपने 'सदस्यों' और 'पूर्व सदस्यों' के लिए पेंशन, भत्ते और लाभों से जुड़े प्रावधान बनाने से नहीं रोकता। यह फैसला लोक प्रहरी नामक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) के महासचिव एस.एन. शुक्ला की याचिका पर आया। पीठ ने 17 फरवरी 2026 को सुनवाई पूरी कर 13 मई 2026 को आदेश सुनाया।
अदालत ने कहा कि राज्य विधानमंडल पर अपने सदस्यों और पूर्व सदस्यों के लिए सामाजिक सुरक्षा उपाय लागू करने पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है। अदालत ने कहा कि दिए गए लाभों में ऐसी कोई मनमानी नहीं दिखी जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करे। याचिका में उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के वेतन, भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980 के प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने और राज्य सरकार को भुगतान रोकने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि पूर्व विधायकों और उनके परिजनों को पेंशन, चिकित्सा, यात्रा जैसी सुविधाएं देना संविधान की भावना के खिलाफ है। राज्य सरकार ने दलील दी कि यह पेंशन दान या अनुग्रह नहीं, बल्कि विधायकों की सार्वजनिक सेवा के सम्मान में दी जाने वाली वैधानिक सुविधा है। ये प्रावधान विधानमंडल द्वारा कानून बनाकर लागू किए गए हैं, इसलिए इन्हें मनमाना नहीं कहा जा सकता।
