बंगाल में राजनीतिक प्रारब्ध और सत्ता ध्रुवीकरण की प्रक्रिया

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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बंगाल और अन्य प्रांतों में क्षेत्रीय पार्टियों की आइडियोलॉजी बहुत स्पष्ट और अद्वितीय नहीं है, बल्कि सत्ता में बदलाव सिर्फ व्यक्तियों का बदलाव मात्र है। बंगाल अब क्षेत्रीय वर्चस्व से हटकर मुखर राष्ट्रवाद की ओर बढ़ रहा है।

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रनबीर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

 

पश्चिम बंगाल की पॉलिटिकल सोशियोलॉजी का करीब से अध्ययन किया जाए तो मालूम होता है कि बीजेपी का सत्ता में आना एक बुनियादी बदलाव का संकेत है। केंद्रित राजनीति से हटकर राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी विचारधारा की ओर राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को ममता ने काफी बदला, लेकिन उनका क्षेत्रीयवाद किसी को सुहाया नहीं। अबकी बार कई पार्टियों के बीच मुकाबले की जगह मुख्य रूप से दो पार्टियों के बीच सीधा मुकाबला हुआ, जिसके परिदृश्य के मुख्य नए बदलावों में अन्य पिछड़ा वर्ग और दलितों को सामाजिक रूप से शामिल करने पर ज़ोर, सांस्कृतिक ध्रुवीकरण में तेज़ी और चुनाव के बाद होने वाली हिंसा में बढ़ोतरी शामिल है। 

एशियाई जर्नल ऑफ़ कंपरेटिव पॉलिटिक्स के छह मई सन् 2022 के अंक में प्रकाशित एक शोधपत्र ‘रीथिंकिंग रीजनल पॉलिटिक्स: बियोंड द 2021 वेस्ट बंगाल इलेक्शन्स’ में समीक्षक विपिन कुमार चिरकरा ने कहा कि बंगाल और अन्य प्रांतों में क्षेत्रीय पार्टियों की आइडियोलॉजी बहुत स्पष्ट और अद्वितीय नहीं है, बल्कि सत्ता में बदलाव सिर्फ व्यक्तियों का बदलाव मात्र है। बंगाल अब मार्क्सवादी/क्षेत्रीय वर्चस्व से हटकर मुखर राष्ट्रवाद की ओर बढ़ रहा है; यह चुनिंदा धर्मनिरपेक्षता से हटकर ‘बंगाली हिंदू सभ्यता’ पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।  

सन् 2022 में आकलन करते समय चिरकरा ने कहा, ‘बीजेपी ने वामपंथी/कांग्रेस की जगह मुख्य विपक्षी दल का स्थान ले लिया है, जिससे चुनाव अब तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सीधी लड़ाई बन गए हैं।’ बीजेपी ने ओबीसी, दलितों और आदिवासियों, विशेष रूप से उत्तरी बंगाल और जंगल महल में, को अपने पक्ष में करने पर ध्यान केंद्रित किया है, जिससे पारंपरिक, अभिजात वर्ग-संचालित राजनीतिक ढांचे टूट रहे हैं। अगर हमें इसे बहुत अच्छे से समझना है, तो हमें सन् 1891 में हर्बर्ट रिज्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ बंगाल’ के अलावा दो और महत्वपूर्ण स्रोतों जैसे कि आशुतोष मित्र की 1953 में प्रकाशित किताब ‘द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ बंगाल’ एवं बंगाल के विभाजन से पहले के जो जिला गज़ेटीयर्स सन् 1905 से 1910 के बीच में तैयार किए गए और जिलों की सेटलमेंट रिपोर्ट्स को देखना होगा। 

बंगाल में सवर्णों, पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जातियों के सामाजिक-धार्मिक व्यवहार, फिरोजशाह तुगलक के ज़माने से बंगाल में मुसलमानों का आगमन और सरदारों को जागीरें देने से स्थानीय हिंदुओं का अवसान, सन् 1947 का विभाजन और पोस्ट-कॉलोनियल पॉलिटिक्स के अलावा बंगाल में अंग्रेजों के समय की जागीरदारी प्रथा और किसानों के जबरदस्त शोषण के इतिहास में सन् 2000 और 2026 के बीच के पॉलिटिकल बदलावों को समझना होगा। विदेशियों और विधर्मियों की आधीनता के अलावा शोषण के लंबे इतिहास ने यहां वाम को उभारा, लेकिन वामदलों को राजनीति से बाहर करने के लिए ममता ने जो पॉलिटिक्स की, उसकी डायनामिक्स को समझे बिना बीजेपी के सत्तासीन होने की डायनामिक्स को भी नहीं समझा जा सकता। 

ममता के विद्रोही तेवर किसी गहन आर्थिक-सामाजिक बदलाव का द्योतक नहीं थे, बल्कि एक प्रकार के खतरनाक क्षेत्रीयवाद का परिचायक रहे। इस लंबे दौर में बंगाल की बौद्धिकों की भूमिका बंगाल के आवाम की बहबूदी के लिए नहीं रही, बल्कि अंग्रेजों को प्रभावित करने, कॉलोनियल लिगेसी को बनाए रखने और एक अलग इलीट वर्ग के उदय से जुड़ी रही। कम्युनिस्टों के शासन काल में बंगाल के इंडस्ट्रियल परिदृश्य को मजदूरों के अराजक आंदोलनों ने ध्वस्त कर दिया। मुर्शिदाबाद से संचालित नबाबी संस्कृति को कलकत्ता की कॉलोनियल चकाचौंध ने फीका कर दिया और वे स्थल सिर्फ एक टूरिस्ट अट्रैक्शन बन कर रह गए।

सन् 1947 के बाद से बंगाल के पहाड़ी क्षेत्रों (दार्जिलिंग) को सिर्फ मनोरंजन स्थल समझा गया और वहां विकास के नाम कलकत्ता की सरकारों ने कुछ न किया। परिणाम स्वरुप सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में हिंसक आंदोलन हुए, जिन्हें सेंट्रल गवर्नमेंट ने ही कंट्रोल किया, लेकिन दार्जिलिंग हिल्स ऑटोनोमस काउंसिल बनाने की कीमत पर।
हिंदू सांस्कृतिक पहचान पर बढ़ा हुआ ज़ोर सिर्फ ममता की राजनीतिक अदूरदर्शिता का परिणाम है, जिसकी जड़ में मुस्लिम समाज को सामान अवसर और सामान विकास से परे हटकर स्टेट फंड्स से भारी उपकार राशि आवंटित की गई और दक्षिण-पश्चिम के जिलों के किसानों की तरक्की के लिए जो पैसा खर्च होना था, उसे डाइवर्ट कर दिया गया। इससे क्षेत्रीय धार्मिक इर्ष्या को बढ़ावा मिला। धार्मिक अभिव्यक्तियों का संभावित सामान्यीकरण किया जाना सही नहीं था। 

बंगाल के सामने लंबे समय से चले आ रहे औद्योगिक ठहराव को हल करने की चुनौती है, साथ ही बीजेपी को बंगाल में अब एक विरोध-आधारित आंदोलन से हटकर एक सत्ताधारी पार्टी के रूप में काम करना सीखना है। अतीत के राजनीतिक ठहराव को समाप्त करते हुए तीव्र सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलावों पर अब एक पब्लिक डिस्कोर्स की जरूरत है, जोकि बंगाल की यूनिवर्सिटीज़ और शांति निकेतन के बौद्धिकों को सोचना है।ममता बनर्जी ने जिस तरह से पंद्रह सालों में बंगाल को ‘मेरा बंगाल’ कहकर पीड़ित बताया, वह बंगाल की जनता के साथ एक भावात्मक धोखे से अधिक नहीं निकला। 

भारत में इस समय एक तरह की राजनीतिक आक्रामकता देखने को मिल रही है, और इसके साथ ही एक 'पुनर्सांस्कृतिकरण' की प्रक्रिया भी बड़ी ही सूक्ष्मता से सामाजिक रीति-रिवाजों को बदल रही है। राजनीतिक परिदृश्य में बढ़ती अराजकता की इस प्रचंडता को काबू कर पाना व्यवहारिक राजनीति का अभिन्न अंग है, जिसके लिए हर बार केंद्रीय सिक्यूरिटी फोर्सेज का बढ़ता इस्तेमाल एक तीव्र सूचक के तौर से हमारे सामने है। इसमें आमजन या अफसरशाही कुछ भी करनी की औकात में नहीं हैं और वे या तो स्थिति को स्वीकार कर चुके हैं या इसमें निष्क्रिय भागीदार हो जाते हैं, जो कि और भी बुरी बात है। (यह लेखक के निजी विचार हैं) 

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