सामयिकी : भारत-यूएई व्यापारिक साझेदारी की ऊंची उड़ान

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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अरविंद जयतिलक लेखक

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई की यात्रा ने दोनों देशों के रिश्ते को मिठास से भर दिया है। दोनों देशों ने कई अहम समझौतों पर मुहर लगाकर रिश्ते को नई ऊंचाई दी है। यूएई की कंपनियों द्वारा भारत में 5 अरब डॉलर के निवेश का एलान किया गया है। यह पहल भारत के विकास के प्रति यूएई की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। दोनों देशों ने रणनीतिक रक्षा साझेदारी को और अधिक मजबूत करने पर हामी भरी है। इसके तहत रक्षा औद्योगिक सहयोग, उन्नत प्रौद्योगिकी, प्रक्षिक्षण, सैन्य सहयोग, समुद्री सुरक्षा और साइबर सुरक्षा पर विशेष रुप से सहमति बनी है। दोनों देशों के बीच जहाज निर्माण और कौशल विकास पर भी समझौते हुए हैं। दोनों देश सुपर कंप्यूटिंग और डिजिटल व्यापार क्षेत्र में भी एक-दूसरे की मदद करेंगे। 

गौरतलब है कि वर्ष के प्रारंभ में दोनों देश एफएटीएफ अर्थात फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स के फ्रेमवर्क के तहत मनी लान्ड्रिंग विरोधी और आतंकवाद फाइनेंस के तहत सहयोग पर पहले ही सहमति जता चुके हैं। दोनों देश रक्षा, एआई डिजिटल सहयोग, खाद्य सुरक्षा, अंतरिक्ष और निवेश में भी एक-दूसरे से कंधा जोड़े हुए हैं। उम्मीद है कि वर्ष 2032 तक दोनों देशों के साझा कारोबार 200 अरब डॉलर तक पहुंच जाएंगे। आज की तारीख में दोनों देशों के बीच एक सौ अरब डॉलर से अधिक का कारोबार हो रहा है। 

यूएई गुजरात के धोलेरा में मेगा निवेश के साथ गिफ्ट सिटी में फर्स्ट आबूधाबी बैंक और डीपी वर्ल्ड का ऑफिस बनाने को तैयार है। गौर करें तो दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्ते लगातार नई ऊंचाई छू रहे हैं और समय की कसौटी पर खरे हैं। गत वर्ष प्रधानमंत्री मोदी की संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की यात्रा के दौरान भी दोनों देश आर्थिक क्षेत्र में क्रांतिकारी पहल करते हुए अपनी करेंसी रुपये और दरहम में व्यापार समझौता शुरू करने पर सहमत हुए थे। आरबीआई और संयुक्त अरब अमीरात के सेंट्रल बैंक के बीच संपन्न हुए समझौते के तहत दोनों बैंक एक फ्रेमवर्क तैयार करने पर सहमति जाहिर की, जिसमें क्रास-बार्डर ट्रांजैक्शन के लिए लोकल करेंसी का इस्तेमाल होगा। 

दोनों देशों के बीच बढ़ती प्रगाढ़ता कई मायने में महत्वपूर्ण है। ऐतिहासिक, राजनीतिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक व आर्थिक कारणों से अरब देश सदैव ही भारत की विदेश नीति में महत्वपूर्ण  व केंद्र बिंदु रहे हैं। यह क्षेत्र भारत के विदेश नीति के रक्षा संबंधित पहलूओं को प्रभावित करता है और इसी को ध्यान में रख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त अरब अमीरात से निर्णायक संबंध जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यह इसलिए भी आवश्यक है कि इस क्षेत्र में नए क्षेत्रीय कुटनीतिक-आर्थिक संबंध तेजी से बनते-बिगड़ते रहे हैं। 

इन परिस्थितियों के बीच संयुक्त अरब अमीरात की भारत से बढ़ती प्रगाढ़ता अति महत्वपूर्ण है। अच्छी बात है कि संयुक्त अरब अमीरात संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन कर चुका है। दोनों देश आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में साथ मिलकर चलने का भी संकल्प ले चुके हैं। फिलहाल भारत को अरब देशों से ऐसे दीर्घकालिक एवं सुसंगत रणनीति के तहत काम करने की जरूरत है, ताकि वह इस क्षेत्र की अपेक्षाएं एवं सरोकार को फलीभूत कर सकें। अच्छी बात यह है कि भारत और यूएई दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण प्रतिरक्षा सहयोग बना हुआ है। जून 2003 में द्विपक्षीय प्रतिरक्षा आदान-प्रदान के लिए संयुक्त प्रतिरक्षा सहयोग समिति यानी ज्वाइंट डिफेंस को-ऑपरेशन कमेटी के गठन के लिए एक मसौदे पर हस्ताक्षर भी किए गए।  (ये लेखक के निजी विचार हैं)