सामयिकी : भट्टों की आग में तपती ज़िंदगियां

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Published By Deepak Mishra
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छोटू सिंह रावत, एक्टिविस्ट

 

भारत जैसे विशाल देश की अर्थव्यवस्था की असली नींव उन करोड़ों श्रमिकों के कंधों पर टिकी है, जो असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। विभिन्न सरकारी आकलनों और श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 47 से 50 करोड़ श्रमिक कार्यरत हैं, जिनमें से करीब 90 प्रतिशत यानी लगभग 42 से 43 करोड़ मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। यह वह वर्ग है, जिसे न तो नियमित वेतन मिलता है और न ही सामाजिक सुरक्षा की पूरी गारंटी। 

इन असंगठित मजदूरों में एक बड़ी संख्या उन लोगों की है, जो रोज़गार की तलाश में अपने घरों को छोड़कर दूसरे राज्यों में प्रवास करते हैं। राजस्थान के विभिन्न जिलों में स्थित ईंट-भट्टों, पत्थर खदानों और निर्माण कार्यों में इन प्रवासी मजदूरों की भारी भागीदारी देखने को मिलती है। खासतौर पर अजमेर, भीलवाड़ा, जयपुर, अलवर और जोधपुर जैसे जिलों में ईंट-भट्टा उद्योग में प्रवासी मजदूरों की संख्या अधिक है। विभिन्न श्रम संगठनों के अनुमानों के अनुसार, केवल राजस्थान के ईंट-भट्टों में ही हर साल 8 से 10 लाख प्रवासी मजदूर काम करने आते हैं।

इन प्रवासी मजदूरों का बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से आता है। उदाहरण के तौर पर अजमेर और भीलवाड़ा के कई ईंट-भट्टों में काम करने वाले मजदूरों में लगभग 60 से 70 प्रतिशत मजदूर छत्तीसगढ़ और बिहार से आते हैं, जबकि शेष मजदूर उत्तर प्रदेश, झारखंड और  ओडिशा से आते हैं। ये लोग अपने पूरे परिवार के साथ यहां आते हैं, जिसमें महिलाएं और किशोरियां भी शामिल होती हैं।

ईंट-भट्टों की दुनिया बाहर से देखने पर सिर्फ मिट्टी, धूल और मेहनत की कहानी लगती है, लेकिन इसके भीतर कई ऐसे सच छिपे हैं, जिन्हें अक्सर हम नजरअंदाज कर देते हैं। खुले आसमान के नीचे, चिमनियों के धुएं के बीच और ईंटों से बने कच्चे घरों में रहने वाली ये किशोरियां काम के साथ-साथ अपने भविष्य के सपने भी बुनती हैं। वे भी चाहती हैं कि उन्हें शिक्षा मिले, वे खेलें-कूदें और एक सम्मानजनक जीवन जिएं, लेकिन हकीकत यह है कि उनके सपने अक्सर भट्टों की तपती आग में ही बुझ जाते हैं।

इन किशोरियों और महिलाओं के हाथों से बनी ईंटें हमारे घरों को मजबूत छत देती हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वे खुद उन्हीं ईंटों के बीच असुरक्षित और असुविधाजनक जीवन जीने को मजबूर हैं। लाखों ईंटों के बीच पनप रही इन जिंदगियों के पास बुनियादी सुविधाएं तक नहीं होतीं। अधिकतर भट्टों पर न तो शौचालय की व्यवस्था होती है और न ही स्नानघर। महिलाओं और किशोरियों को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है, जहां उन्हें हर समय असुरक्षा का भय बना रहता है।

सरकार द्वारा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनका उद्देश्य उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाना है। ई-श्रम पोर्टल के माध्यम से असंगठित मजदूरों का पंजीकरण किया जा रहा है, ताकि उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके। प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना के तहत वृद्धावस्था में पेंशन की सुविधा दी जाती है। प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के माध्यम से कम प्रीमियम पर बीमा सुरक्षा प्रदान की जाती है।

इसके अलावा आयुष्मान भारत योजना के तहत गरीब परिवारों को स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिलता है। महिलाओं की स्वच्छता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए स्वच्छ भारत मिशन और उड़ान योजना जैसी पहल भी शुरू की गई हैं, जिनका उद्देश्य शौचालय निर्माण और सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। (यह लेखक के निजी विचार हैं)