कहीं आपका लाडला भी तो नहीं हो रहा ऑटिज्म का शिकार? 2 साल से छोटे बच्चों को मोबाइल देना पड़ सकता है भारी

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Published By Muskan Dixit
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मोबाइल थमा अभिभावक अनजाने में छीन रहे बच्चों के बोलने की प्राकृतिक क्षमता

पुनीत श्रीवास्तव, अयोध्या, अमृत विचार : छोटे-छोटे हाथों में मोबाइल थमाकर अभिभावक अनजाने में अपने बच्चों की बोलने की प्राकृतिक क्षमता छीन रहे हैं। छह से नौ माह की उम्र में बच्चे बबलिंग (बड़बड़ाना) शुरू कर देते हैं। एक साल की उम्र में ‘मम्मी’, ‘पापा’, ‘बाबा’ जैसे शब्द बोलने लगते हैं और दो साल की उम्र तक ‘मम्मी आओ’, ‘खाना दो’, ‘पापा पानी’ जैसी दो-तीन शब्दों की वाक्य रचना कर लेते हैं, लेकिन आज मोबाइल-इंटरनेट के युग में यह सामान्य विकास पटरी से उतर रहा है। रामनगरी के राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग में ऐसे कई मामले आए दिन सामने आ रहे हैं, जहां बच्चे उम्र के अनुसार बोल नहीं पा रहे हैं।

विभागाध्यक्ष डॉ. प्रदीप यादव बताते हैं कि बच्चे से जितनी बात की जाएगी, वे उतनी ही जल्दी और बेहतर बोलना शुरू करेंगे, लेकिन आज माता-पिता दूध पिलाते समय, खाना खिलाते समय, रोते समय या सुलाते समय मोबाइल पकड़ा देते हैं। बच्चा स्क्रीन की रंग-बिरंगी दुनिया में खो जाता है और असली दुनिया की आवाज व शब्दों से दूर हो जाता है। उन्होंने कहा कि इससे न केवल भाषा विकास में देरी हो रही है बल्कि बच्चे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) के जोखिम में भी बढ़ रहे हैं। मोबाइल की लगातार स्क्रीन समय बच्चे के सामाजिक विकास (सोशलिज्म) को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। यही नहीं इससे बच्चों की आंखों की रोशनी भी प्रभावित हो रही है। उन्होंने मेडिकल कॉलेज में हर माह ओपीडी के दौरान ऐसे 20 फीसदी केस सामने आ जाते हैं। हालांकि कुछ बाल रोग विभाग में भी चले जाते हैं।

परिवार के सदस्यों को दोहरवाने चाहिए शब्द

पहले के समय में बच्चा परिवार के बीच रहता था। दादी-नानी, बाबा, चाचा-बुआ, मम्मी-पापा हर कोई उसे पुकारता, लोरियां व कहानियां सुनाता और शब्द दोहरवाता। इस प्राकृतिक बातचीत से बच्चे का मस्तिष्क भाषा केंद्र विकसित होता था। अब मोबाइल ने उस परिवारिक संवाद को लगभग समाप्त कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों में आंखों की समस्या, नींद की कमी, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता घटना और भावनात्मक जुड़ाव कम होना जैसे लक्षण भी बढ़ रहे हैं। दो-तीन साल के बच्चे जो पहले पूरे वाक्य बोल लेते थे, आज मुश्किल से कुछ शब्द ही बोल पा रहे हैं। कई मां-बाप जब बच्चा बोलने में देरी दिखाता है तब चिंतित होकर अस्पताल पहुंचते हैं, लेकिन तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है।

जागरूकता की जरूरत

अभिभावकों को समझना चाहिए कि मोबाइल कोई बेबीसिटर नहीं है। दो साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल या टीवी से पूरी तरह दूर रखना चाहिए। रोज कम से कम एक-दो घंटे बच्चे से आंखों में आंखें डालकर बात करें, किताब पढ़कर सुनाएं, गाने गाएं और खेलें। बच्चे का विकास स्क्रीन पर नहीं है।

68 में से एक बच्चा एएसडी का शिकार

मेडिकल कॉलेज में मानसिक रोग विभागाध्यक्ष डॉ. प्रदीप यादव बताते हैं कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) से देश भर में अब तक 80 लाख बच्चे शिकार हो चुके हैं। देश में हर 68 में से एक बच्चा एएसडी का शिकार हो रहा है। इसका इलाज सिर्फ अभिभावकों की काउंसिलिंग ही है।

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