यूपी में झींगा पालन के लिए पहली बार बनेगा रेगुलेटरी फ्रेमवर्क, योगी सरकार ने जारी किए निर्देश
-अंतर्देशीय खारे जल क्षेत्रों में नियंत्रित होगा एल वन्नामेई झींगा पालन -जैव-सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसान पंजीकरण के लिए नई व्यवस्था लागू
लखनऊ, अमृत विचार: प्रदेश सरकार ने अंतर्देशीय खारे जल क्षेत्रों में झींगा पालन को वैज्ञानिक और नियंत्रित तरीके से विकसित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। मत्स्य विभाग ने प्रदेश में पहली बार एल वन्नामेई झींगा पालन के लिए विस्तृत रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार किया है। इसके तहत झींगा पालन करने वाले किसानों को पंजीकरण और अनुमति लेना अनिवार्य होगा, वहीं जैव-सुरक्षा, जल प्रबंधन और पर्यावरणीय मानकों का पालन भी सुनिश्चित कराया जाएगा।
मत्स्य विभाग के अपर मुख्य सचिव मुकेश मेश्राम ने शुक्रवार को जारी निर्देश में कहा है कि यह व्यवस्था प्रदेश के अंतर्देशीय खारे जल क्षेत्रों में लागू होगी। इसका मुख्य उद्देश्य झींगा पालन को वैज्ञानिक आधार देना, रोग नियंत्रण सुनिश्चित करना और पर्यावरणीय क्षति को रोकना है।
शासन ने जिला स्तर पर समितियों (डीएलसी) के गठन का भी निर्देश दिया है, जो आवेदन, निरीक्षण और अनुमति प्रक्रिया की निगरानी करेंगी। नई व्यवस्था के तहत बिना अनुमति कोई भी व्यक्ति झींगा पालन नहीं कर सकेगा। किसानों को आवेदन के साथ भूमि विवरण, जल परीक्षण रिपोर्ट, फार्म लेआउट और जैव-सुरक्षा योजना प्रस्तुत करनी होगी। जिला स्तरीय समिति 60 दिनों के भीतर निरीक्षण कर अनुमति देगी।
प्रदेश सरकार का मानना है कि नियंत्रित और वैज्ञानिक झींगा पालन से किसानों की आय बढ़ेगी, निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और मत्स्य क्षेत्र में नए निवेश आएंगे। साथ ही पर्यावरणीय संतुलन और जैव-सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी यह नीति अहम भूमिका निभाएगी।
एसपीएफ बीज और जैव-सुरक्षा होगी अनिवार्य
शासन ने स्पष्ट किया है कि केवल सीएए से अनुमोदित हैचरी से प्राप्त विशिष्ट रोगजनक-मुक्त (एसपीएफ) बीज का ही उपयोग किया जाएगा। फार्म पर फेंसिंग, बर्ड स्केयर और अलग-अलग उपकरणों की व्यवस्था अनिवार्य होगी ताकि संक्रमण का खतरा कम किया जा सके। इसके साथ ही खुले जल स्रोतों से जुड़े फार्मों में एफ्लुएंट ट्रीटमेंट सिस्टम (ईटीएस) स्थापित करना भी जरूरी होगा। प्रदूषित पानी को सीधे सार्वजनिक जल स्रोतों में छोड़ने पर कार्रवाई की जाएगी। शासन ने प्रतिबंधित एंटीबायोटिक और रसायनों के उपयोग पर भी रोक लगाई है।
जिला स्तर पर होगी निगरानी
रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के अनुसार जिलाधिकारी या उनके नामित मुख्य विकास अधिकारी की अध्यक्षता में जिला स्तरीय समिति गठित होगी। इसमें जिला मत्स्य अधिकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राजस्व विभाग और भूगर्भ जल विभाग के प्रतिनिधि शामिल रहेंगे। समिति आवेदन की जांच, स्थल निरीक्षण और मानकों के पालन की निगरानी करेगी। शासन ने आवेदन, निरीक्षण, अनुमति और निगरानी की पूरी प्रक्रिया भी तय कर दी है। किसानों को आवेदन पत्र के साथ भूमि स्वामित्व, जल परीक्षण, फार्म मैप और आकस्मिक योजना देनी होगी। अनुमति मिलने के बाद भी नियमित निरीक्षण और रिकॉर्ड संधारण अनिवार्य रहेगा।
