प्रसंगवश : रोजगार की जरूरतों में अनदेखी होती शिक्षा

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Published By Deepak Mishra
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महावीर, एक्टिविस्ट

 

भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। गांवों से शहरों की ओर पलायन अब केवल रोजगार की मजबूरी नहीं, बल्कि बेहतर जीवन की तलाश बन चुका है। हर दिन सैकड़ों परिवार मजदूरी, निर्माण कार्य, घरेलू काम और छोटे रोजगार की उम्मीद में यहां पहुंचते हैं, शहर उन्हें रोजगार तो देता है, सम्मानजनक जीवन नहीं।

यही कारण है कि शहर की चौड़ी सड़कों, ऊंची इमारतों और चमकदार बाजारों के किनारे बड़ी संख्या में झुग्गी-झोपड़ियां बसती जा रही हैं। इन झुग्गियों में रहने वाले परिवारों का संघर्ष केवल दो वक्त की रोटी तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ी चिंता अपने बच्चों का भविष्य है। शिक्षा, जो किसी भी बच्चे के जीवन को बदल सकती है, वही इन बस्तियों में सबसे अधिक उपेक्षित दिखाई देती है।

भारत की जनगणना और विभिन्न सरकारी रिपोर्टों के अनुसार देश की शहरी आबादी का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक बस्तियों में रहता है। नीति आयोग और यूडीआईएसई प्लस के आंकड़े बताते हैं कि देश में आज भी लाखों बच्चे नियमित शिक्षा से बाहर हैं। खासकर प्रवासी मजदूरों के बच्चों में स्कूल छोड़ने की दर अधिक है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक अस्थिरता, बार-बार स्थान बदलना, अभिभावकों की अशिक्षा और सामाजिक असुरक्षा इसके प्रमुख कारण हैं।

अलग-अलग जिलों और राज्यों से रोजगार की तलाश में मजदूर शहरों में आते हैं। अधिकतर लोग दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। उनके लिए हर दिन काम मिलना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई अक्सर पीछे छूट जाती है। कई परिवार आर्थिक तंगी के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं से भी जूझते हैं।

कुछ अभिभावकों में शराब की लत जैसी समस्याएं हैं, जिसका सीधा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में समावेशी शिक्षा और हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने की बात कही गई है। सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार, मध्याह्न भोजन योजना और निःशुल्क शिक्षा जैसी कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसके बावजूद झुग्गी बस्तियों के बच्चों तक इन योजनाओं का पूरा लाभ नहीं पहुंच पा रहा। 

जब किसी बच्चे को घर से बेहतर भोजन स्कूल में मिले, तो यह केवल गरीबी नहीं बल्कि सामाजिक असमानता की भी कहानी कहता है। अहम सवाल यह है कि क्या शिक्षा वास्तव में उन बच्चों तक पहुंच रही है, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है? क्या केवल नामांकन कर देना पर्याप्त है? क्या ऐसे बच्चों के लिए अलग सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सहायता की जरूरत नहीं है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रवासी और झुग्गी बस्ती के बच्चों के लिए सामान्य शिक्षा मॉडल पर्याप्त नहीं है। इनके लिए लचीली शिक्षा व्यवस्था, सामुदायिक शिक्षण केंद्र, स्थानीय स्वयंसेवी समूहों की भागीदारी और अभिभावकों में जागरूकता बेहद जरूरी है। शिक्षा केवल किताबें और परीक्षा नहीं होती। यह आत्मविश्वास, सुरक्षा और अवसरों का रास्ता खोलती है, लेकिन जब बच्चा भूख, असुरक्षा और पारिवारिक संघर्ष के बीच बड़ा होता है, तब उसके लिए स्कूल तक पहुंचना भी किसी संघर्ष से कम नहीं होता।

आज आवश्यकता केवल सरकारी योजनाओं की घोषणा की नहीं, बल्कि जमीन पर संवेदनशील क्रियान्वयन की है। झुग्गी बस्तियों के बच्चों को गरीब बच्चे मानकर सहानुभूति देने से आगे बढ़ना होगा। उन्हें बराबरी का अवसर देना होगा, क्योंकि इन्हीं बस्तियों से भविष्य के शिक्षक, खिलाड़ी, कलाकार और वैज्ञानिक निकल सकते हैं।

महानगरों की चमक के पीछे छिपी स्लम बस्तियों की यह दुनिया हमें बार-बार याद दिलाती है कि विकास केवल इमारतों से नहीं मापा जा सकता। किसी भी समाज का असली विकास तब माना जाएगा, जब उसकी सबसे कमजोर बस्ती का बच्चा भी बिना डर, भूख और भेदभाव के स्कूल जा सके। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शहर की चमकती सड़कों के किनारे बसी झुग्गियों में सपने केवल जन्म ही नहीं लेते हैं, बल्कि पूरे होने का अधिकार भी रखते हैं। (यह लेखक के निजी विचार हैं)

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