पाप के अंत के लिए विधि को करनी पड़ती है व्यवस्था

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Published By Muskan Dixit
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सलिल पांडेय, मिर्जापुर

MUSKAN DIXIT (67)

रातों-रात धनी बनने एवं रौबदार जीवन जीने के लिए हमेशा झूठ बोलना, दूसरों को धोखा देना, चुगली-निंदा में लगे रहना तथा किसी से कुछ लेकर उसे वापस न करना, यह सब निंदनीय कार्य है। ऐसे कार्यों में लगे रहने वाला यदि धन कमा भी लेता है तो भी लोग उसे बुरी नजर से ही देखते है। उसकी बहुत जल्द बदनामी भी  होने लगती है, लेकिन अपने रुआब में वह किसी की बात की परवाह नहीं करता है। प्रायः ऐसे लोग एक जबरदस्त गिरोह बना लेते हैं। लोगबाग गिरोह से मुकाबला न करने की स्थिति में चुप रहना ही उचित समझते हैं, लेकिन किसी न किसी दिन कोई ऐसा प्रकट हो जाता है जो ऐसे गिरोह को नेस्तनाबूद कर देता है। आए दिन समाज में देखने को मिलता है कि जिसके नाम से लोग थर्राते थे, उसका अंत अत्यंत बुरे ढंग से होता है। ऐसी स्थिति में इन कथित रुआबदारों का कोई साथ नहीं देता।

उदाहरण के रूप में लिया जाए तो द्वापर युग में कृष्ण का मामा कंस था। वह अन्यायी था। जब भविष्यवाणी हुई कि उसकी बहन देवकी का आठवां पुत्र उसका विनाश करेगा, तब वह कांपने लगा। उसकी भरसक कोशिश यही थी कि देवकी के पुत्रों को वह मार डाले। उसने ऐसा जघन्य कार्य किया भी, लेकिन पाप का चूंकि अंत होना था, तो विधि ने ऐसी व्यवस्था की कि कृष्ण रातोंरात नन्द के घर चले गए और उनकी जगह योगमाया आ गई, जिसको जब कंस ने मारना चाहा तो योगमाया उसके हाथों से छूट कर आकाश मार्ग की ओर चली गई तथा कंस को चेतावनी देते हुए कहा, 'रे कंस, तुझे मारने वाला पैदा हो गया है।' योगमाया की इस ध्वनि को कंस ने 'काल-ध्वनि' के रूप में लिया और हर संभव कोशिश करने लगा कि कृष्ण को मार डाला जाए।

धार्मिक उद्धरणों की तरह समाज में पनपने वाले कंस सरीखे लोगों का भी यही हश्र होता है। कोई न कोई ऐसा प्रकट हो जाता है, जिसके हाथों ऐसे लोगों को सबक सिखाने का मौका मिल जाता है। अतः इंसान को चाहिए कि वह बुरी लतों से दूर रहे। वरना किसी न किसी दिन दंड मिलकर रहता है।

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