US-Iran Talks Fail: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, न्यूक्लियर प्रोग्राम और मिसाइलें... पाकिस्तान में क्यों टूट गई अमेरिका-ईरान की मैराथन वार्ता?

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
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इस्लामाबाद: अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई उच्चस्तरीय शांति वार्ता बेनतीजा रही। 21 घंटे से ज्यादा समय तक चली गहन चर्चाओं के बावजूद दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने खुद इसकी पुष्टि की और कहा कि ईरान ने अमेरिका की दी गई शर्तों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

वेंस ने संवाददाताओं से कहा, “अच्छी खबर यह है कि हमने ईरानी प्रतिनिधिमंडल के साथ कई सार्थक चर्चाएं कीं। बुरी खबर यह है कि हम किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाए। ईरान ने हमारे प्रस्तावों को ठुकरा दिया है। यह अमेरिका के लिए जितनी बुरी खबर है, उससे कहीं ज्यादा ईरान के लिए बुरी खबर है।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिकी टीम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, रक्षा सचिव पीट हेगसेथ, विदेश सचिव मार्को रुबियो और सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर सहित पूरी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम से लगातार संपर्क में थी। वेंस ने कहा कि अमेरिका ने अपना “अंतिम और सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव” रख दिया था, लेकिन ईरान उस पर सहमत नहीं हुआ।

पाकिस्तान की भूमिका पर क्या बोले वेंस?

अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने पाकिस्तान की सराहना करते हुए कहा कि बातचीत में जो भी कमी रह गई, वह पाकिस्तानी मेजबानों की वजह से नहीं थी। उन्होंने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को “शानदार मेजबान” बताया और कहा कि पाकिस्तान ने दोनों पक्षों के बीच मतभेद सुलझाने की पूरी कोशिश की।

वार्ता क्यों फेल हुई? जानें मुख्य कारण

वार्ता के विफल होने के पीछे तीन बड़े मुद्दे बताए जा रहे हैं:

- होर्मुज जलडमरूमध्य: ईरान इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर अपना पूर्ण नियंत्रण चाहता था, जबकि अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग मानता है और इसके खुला रखने पर जोर दे रहा था। होर्मुज से दुनिया का करीब पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है।

- परमाणु कार्यक्रम: अमेरिका की मुख्य मांग थी कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की किसी भी कोशिश को हमेशा के लिए छोड़ दे, अपनी समृद्ध यूरेनियम स्टॉक अमेरिका को सौंपे या नष्ट कर दे। ईरान इस पर कोई ठोस गारंटी देने को तैयार नहीं हुआ।

- बैलिस्टिक मिसाइलें और क्षेत्रीय प्रभाव: अमेरिका ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता पर भी पाबंदी चाहता था, जो ईरान के लिए रेड लाइन साबित हुई।

ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका की तरफ से “अत्यधिक और अनुचित मांगें” रखी गईं, जिन्हें स्वीकार करना असंभव था। ईरानी प्रवक्ता ने जोर दिया कि सफलता के लिए अमेरिका को ईरान के वैध अधिकारों और हितों का सम्मान करना होगा।

आगे क्या?

वार्ता विफल होने के बाद दोनों पक्षों में तनाव फिर बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा अमेरिका के लिए अपनी साख बचाने का सवाल भी बन गया था। फिलहाल दोनों देश वापस अपने-अपने रुख पर अड़े दिख रहे हैं।

यह 1979 के बाद अमेरिका और ईरान के बीच हुई सबसे लंबी प्रत्यक्ष वार्ता थी, लेकिन अंत में कोई डील नहीं हो सकी।

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