सूचना के दौर में खतरनाक साबित हो रहा डीपफेक

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Published By Muskan Dixit
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अजय दयाल, हल्द्वानी-

MUSKAN DIXIT (66)

डिजिटल युग में तो हम रमते जा रहे हैं, अब इस युग के आर्टिफिशियल इंटलिजेंस कल्चर से भी अछूते नहीं रहे। इसी कल्चर का एक हिस्सा अगर हमें प्रगति करने को स्मार्ट बना रहा है तो वहीं, दूसरा डीपफेक हमारी सिरदर्दी का बड़ा कारण बन चुका है। इस डीपफेक संस्कृति ने मानो कटाक्ष में अनैतिकता को देखकर कहे जाने वाले ‘घोर कलयुग’ की शब्दावली को वाकई परिभाषित कर दिया हो।

वास्तव में डीपफेक ने सत्य को ही संदेहास्पद बना दिया। अब आंखों देखी और कानो सुनी भी सत्य नहीं रहा। वीडियो, फोटो में हूबहू जिस शख्स को हम देखते हैं, विश्वास नहीं कर सकते कि वही हो। ऐसा ही आवाज के साथ है, किसी अपने की ही चिरपरिचित कॉल धोखा दे सकती है। पुरानी कहावत है, देखकर और कानो से सुनकर ही विश्वास करो। कैसे करें?  
 
दरअसल, डीपफेक केवल मनोरंजन या चेहरे बदलने की तकनीक नहीं है। इसके खतरे विध्वंसकारी हैं। किसी लोकप्रिय नेता का भ्रामक डीपफेक बयान सामाजिक हिंसा की वजह बन सकता है। वहीं, निजी स्तर पर स्त्रियों के खिलाफ बढ़ते 'डिजिटल क्राइम' और 'वॉयस क्लोनिंग' के जरिए फाइनेंशियल-फ्रॉड ने समाज में एक अविश्वास का माहौल फैला रखा है। हकीकत यह है कि ऐसी तकनीक व्यक्ति की पहचान को ही हथियार बना रही है। हद तो यह है कि ईश्वरीय स्वरूप तक से छेड़छाड़ की जा रही है।

याद कीजिए भारतीय परिवेश में हम ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ की संस्कृति को जेहन में रखकर पले-बढ़े हैं। यह वाक्यांश भारतीय दर्शन में ईश्वर के शाश्वत स्वरूप को दर्शाता है, जहां सत्य यानी अविनाशी, शिव यानी कल्याणकारी और सुंदरम् यानी सौंदर्य को एक ही परम् तत्व ब्रह्म के तीन पहलू समझा गया है।

सही मायनों में सत्यम यानी सत्य का अर्थ है जो कभी न बदले, जो त्रिकालाबाधित अर्थात अतीत, वर्तमान और भविष्य में एक समान रहे। शिवम् यानि शुभ या कल्याणकारी शिव का आशय उस तत्व से है, जो सर्वोच्च शुभ है और जिसमें पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ है। इसी तरह सुंदरम् यानी सुंदर या सौंदर्य का आशय शारीरिक सुंदरता से नहीं बल्कि परम् सत्य के साथ सामंजस्य में होने वाली सुंदरता से है।

भारतीय दर्शन कहता है कि किसी भी कार्य, नीति या वस्तु की तभी स्वीकार्यता है, जब उसमें तीनों गुण- सत्य, कल्याण और सुंदरता विद्यमान हों। अब ऐसे में मौजूदा डीपफेक कल्चर, क्या हमारी पुरातन अथवा सनातनी संस्कृति के साथ घृणित मजाक नहीं? 

लगता है 21वीं सदी में सत्य की परिभाषा ही बदल गई है। जिस एआई तकनीक ने हमें भविष्य के सपने दिखाए थे, उसी का एक भाग डीपफेक अब हमारे वर्तमान के लिए सिरदर्द बना हुआ है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बनाए गए सच दिखने वाले फेक वीडियो और ऑडियो ने दिग्भ्रमित कर रखा है। यहां सवाल केवल तकनीक के दुरुपयोग का नहीं, बल्कि हमारी डिजिटल सुरक्षा और लोकतांत्रिक व निजी मूल्यों के अस्तित्व के साथ हनन का भी है।

राहत की बात यह है कि इस संकट से निपटने के लिए दुनिया अब सतर्क-सचेत हो रही है। भारत सरकार ने इस दिशा में सख्त कदम उठाए हैं। आईटी नियमों (2021) के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय हो गई है। ऐसे में 24 घंटे के भीतर आपत्तिजनक सामग्री हटानी होगी। इतना ही नहीं, इंटेल और माइक्रोसॉफ्ट जैसे डिजिटल दुनिया के दिग्गज अब ऐसे डिटेक्शन टूल्स (जैसे फेक कैचर) विकसित कर रहे हैं, जो हयूमन बॉडी के सूक्ष्म जैविक संकेतों (जैसे ब्लड फ्लो) के आधार पर असली और नकली का अंतर साफ कर सकते हैं। वहीं, 'डिजिटल वॉटरमार्किंग' जैसे प्रयोग भविष्य में कंटेंट की प्रामाणिकता को प्रमाणित करने के लिए एक डिजिटल पासपोर्ट का काम करेंगे।

वैसे दूसरा एक सकारात्मक पहलू भी है, जिस पर चर्चा से अछूता नहीं रहना चाहिए। डीपफेक की जननी, यानी जेनरेटिव एआई, शिक्षा और मनोरंजन क्षेत्र में वरदान साबित हो रही है। ऐतिहासिक पात्रों को जीवित करना हो या उन लोगों को आवाज देना जो बोल नहीं सकते, जैसी सुगमता वाकई अद्भुत है। यानी सकारात्मक संभावनाएं भी अनंत हैं।

सकारात्मक संभावनाओं की ही दिशा में कार्य करते हुए डीपफेक के इस डिजिटल कोहरे को हम तकनीकी सुरक्षा और मानवीय विवेक की रोशनी से ही दूर कर सकेंगे। आम नागरिक, सरकार और टेक कंपनियों को मिलकर यह जिम्मेदारी उठानी होगी। संयुक्त अभियान चलाने जैसा इस दिशा में कदमताल करके ही एआई को वास्तव में विकास का एक सुरक्षित इंजन बनाने में सफलता पाई जा सकती है।

कुल मिलाकर अतः समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि उसके अनैतिक उपयोग में है। आश्य यह है कि हमें इनोवेशन का गला नहीं घोटना चाहिए। साथ ही, उपयोग और दुरुपयोग के बीच बड़ी समझदारी से एक महीन संतुलन बनाकर चलना होगा। सच्चाई भी यही है कि इस क्षेत्र पर लागू कोई भी कानून या सॉफ्टवेयर तब तक पूरी तरह प्रभावी नहीं हो सकता, जब तक हम डिजिटल साक्षर न हों। डिजिटल दुनिया में हमें शक करो और पुष्टि करो के सिद्धांत को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाना ही होगा।

ताजा उदाहरण हाल ही में देखने को मिला। साइबर अपराधियों के जंजाल में फंसे बरेली के एक दंपति को उनके 13 साल के बेटे ने बर्बाद होने से बचा लिया। कक्षा आठ में पढ़ने वाले छात्र ने न सिर्फ 10 घंटे से डिजिटल अरेस्ट मम्मी-पापा को मुक्त कराया, बल्कि खुद को एटीएस अफसर बताकर फर्जी वारंट भेजने वाले क्रिमिनल की बातचीत भी रिकार्ड कर ली। पता होते ही पुलिस ने भुक्तभोगी दंपति का बैंक अकाउंट फ्रीज कर पैसे की निकासी रुकवाई और लाखों का साइबर फ्रॉड नहीं होने दिया। दरअसल, यह छात्र न केवल अखबारों में साइबर फ्रॉड की खबरें पढ़ता रहता था, बल्कि उसके कॉलेज टीचर ने भी इस बारे में जागरूक कर रखा था। 

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