नागरिक शिष्टाचार भी संविधान का अंग
आकाश सपेलकल, वकील, सुप्रीम कोर्ट-
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किसी भी देश में राजदूतों की नियुक्तियां प्रायः सत्ता दल की मर्जी पर ही होते हैं। इनमें ज्यादातर नियुक्तियां राजनीतिक होती और कुछ ब्यूरोक्रेट्स आधारित होती है। राजदूतों की नियुक्ति में यही प्रक्रिया नेपाल की भी है। अभी जिन देशों के राजदूतों को वापस बुलाने का फरमान जारी हुआ है उसमें भारत, चीन, अमेरिका, जापान,यूके और आस्ट्रेलिया शामिल हैं। इन देशों के राजदूतों को एक महीने के भीतर नेपाल वापस आना होगा। इसके पहले रूस, सउदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, इजरायल, श्रीलंका, स्पेन, जर्मनी, दक्षिण कोरिया,कतर, डेनमार्क और मलेशिया के राजदूतों को वापस बुलाने का फरमान जारी हुआ था। नेपाल के 182 देशों से राजनयिक संबंध हैं, नई सरकार के सत्ता रूढ़ होने के बाद अब इनमें व्यापक बदलाव शुरू हो गया है।
पूर्व के राजदूतों की वापसी और नए की नियुक्ति प्रक्रिया में करीब एक माह तक समय लग सकता है। इस बीच नए राजदूतों के चयन को लेकर सत्ता रूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के भीतर मंथन का दौर जारी है। चर्चा है कि प्रधानमंत्री बालेन शाह, गृहमंत्री सुडान गुरूंग और पार्टी अध्यक्ष रवि लामी छाने के बीच राजदूतों की नियुक्ति को लेकर लगातार बैठकें चल रही है। प्रधानमंत्री बालेन शाह और गृहमंत्री सुडान गुरूंग चाहेंगे कि इस पद पर राजनीतिक नियुक्तियां कम से कम हों ताकि नेताओं की सिफारिश और लाविंग जैसी स्थिति से बचा जा सके। राजदूत जैसे उच्च पद पर ज्यादातर नियुक्तियां पूर्व जज,और उच्च पदों पर रहे ईमान दार अफसरों में से होने की उम्मीद है। ऐसे अफसरों को टटोलने का क्रम जारी है जिनमें वैश्विक समझ हो और वे नेपाल और अपनी नियुक्त वाले देश से बेहतर तालमेल बैठाने की समझ रखते हों।
नेपाल अब पहले वाला नेपाल नहीं रहा। यहां न तो राजशाही है और न भ्रष्टाचार में लिप्त केवल अपने परिवार को लेकर चिंतित रहने वालों की हुकूमत है। जेन जी आंदोलन के बाद नेपाल को जरूर थोड़ा बहुत नुक्सान सहना पड़ा लेकिन उसके बाद एक युवा और अपेक्षाकृत जनता को परिवर्तन की अनुभूति दिलाने वाली सरकार का जन्म भी हुआ। यह अनुभूति दुनिया के अन्य देशों को भी हो ताकि वे नेपाल को देखने वाले अपने पुराने नजरिए में बदलाव ला सकें। जाहिर है नेपाल अपने राजनयिक संबंध वाले देशों में ऐसा बदलाव तभी ला पाएगा जब उसके नई सरकार की सोच और अपेक्षा पर खरा उतरने में सक्षम राजनयिक हों। राजदूतों की नियुक्त को लेकर बालेन सरकार काफी सोच समझकर निर्णय लेगी ताकि उसे न तो अंतर्विरोध का सामना करना पड़े और न ही राजदूतों की योग्यता पर सवाल खड़ा हो।
