उस महान यात्रा की तैयारी अभी से की जाए

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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हमें एक दिन मृत्यु की गोद में जाना ही है। जीवन का उद्वेश्य है कि हम ईश्वर का साक्षात्कार करें, परमपद को पाएं। किंतु कितने लोग हैं, जो इस ओर ध्यान देते हैं? किसी को तृष्णा से छुटकारा नहीं। कोई इन्द्रिय भोगों में मस्त है। कोई अहंकार में ऐंठा जा रहा है, तो कोई भ्रम जंजाल मे ही मस्त है। इन विडंबनाओं को उलझाते-सुलझाते यह सुनहरा अवसर निकलता जा रहा है। मृत्यु सिर के ऊपर नाच रही है। पल का भरोसा नहीं। न जाने किस घड़ी मौत गला दबा दे। आज आप जाने क्या-क्या योजनाएं बना रहे हो, हो सकता है कल यह सब धरे के धरे रह जाएं और हमारा डेरा किसी दूसरे देश ही जा गड़े।

ऐसी विषम बेला में अचेत रहना बड़े दुर्भाग्य की बात है। अभी भी समय है। आंखें खोलिए। सचेत हो जाइए। जीवन क्या है, हम क्या हैं, संसार क्या है, हमारा उद्वेश्य क्या है? इन प्रश्नों को उतना ही महत्वपूर्ण समझिए, जितना कि रोटी को समझते हैं। निरंतर इन प्रश्नों पर विचार करने से आप उस मार्ग पर चल पड़ेगें, जिसे मृत्यु की तैयारी महते हैं, जो काम कल करना है, उसका बंधन आज से सोचना होगा। आपकी मृत्यु का समय आपको नहीं पता, इसलिए उसकी तैयारी आज से, इसी क्षण से आरंभ करनी चाहिए।

अनासक्ति कर्मयोग के तत्वज्ञान को समझकर जीना उत्तम है। माया के बंधन हमें इसलिए बांध दते हैं कि हम उनमें लिपट जाते हैं। तन्मय हो जाते हैं। स्त्री, पुत्र, कुटुंब, परिवार का बड़े प्रेमपूर्वक पालन कीजिए, उन्हें अपनी संपत्ति नहीं, पूजा का आधार बनाइए। उन्हें अपनी जायदाद न मानना। नहीं तो बुरी तरह मारे जाआगे। बड़ा भारी धोखा खाआगे। संपत्ति उपार्जन अवश्य कीजिए, पर किसी सही उद्वेश्य से। न कि शहद की मक्खियों की तरह कष्ट सहने के लिए। सब काम उसी प्रकार कीजिए जैसा संसारी लोग करते हैं, पर अपना दृष्टिकोण दूसरा रखिए। स्मरण रखिए संसार की वस्तुएं आपकी वस्तु नहीं है। दूसरी आत्माएं आपकी गुलाम नहीं हैं।

मेरा-तेरा दोनों एक साथ नहीं रह सकते। बस, माया की सारी गांठ इतनी ही है। योग का सारा ज्ञान इसी गांठ को सुलझाने के लिए है। पाप कर्म हम इसलिए करते हैं कि हमारा अहंभाव बहुत ही संकुचित होता है। जब आप कहते हैं कि मेरी जायदाद इतनी है, तो प्रकृति गाल पर तमाचा मारती है कि मूर्ख! तू कुछ ही समय से आकर इस पर अधिकार जमाता है, यह प्रवाह अनादिकाल से चला आ रहा है। सोना-चांदी तेरा नहीं है प्रकृति का है। जिसे तू स्त्री समझता है, यह असंख्य बार तुम्हारी मां हो चुकी होगी। आत्माएं स्वतंत्र हैं, कोई किसी का गुलाम नहीं है। विश्व का कण-कण बड़ी ही द्रुतगति से नाच रहा है। कोई वस्तु स्थिर नहीं है। बहती हुई नदी का आनंद देखना है, तो देख, रोकने खड़ा होगा, तो एक ओर हटा दिया जाएगा।

दुख, विपत्ति, व्यथा और पीड़ा का कारण अज्ञान है। मृत्यु के समय दुख प्राप्त करने का, नरक की ज्वाला में जलने का, भूत-प्रेतों में भटकने का, जन्म-मरण की फांसी में लटकने का एक ही कारण है- अज्ञान, केवल अज्ञान। अंधकार से प्रकाश की ओर चलिए। मृत्यु से अमृत की ओर चलिए। मजहबी कर्मकांड आत्मा का हित नहीं कर सकते। दूसरों की ओर मत ताकिए कि कोई हमें पार कर देगा। केवल पूर्णगुरू की आपको पार कर सकता है। उनके मार्गदर्शन में अपने हृदय को विशाल, उदार, उच्च और महान बनाइए। अहंभाव को हटाकर सबको आत्मदृष्टि से देखिए। अपनी अंतरात्मा को प्रेम में सराबोर कर लीजिए और प्रेम का अमृत समस्त संसार पर बिना भेदभाव के छिड़किए। अपना कर्तव्य धर्मनिष्ठापूर्वक पालन कीजिए। व्यवहार कर्मों में रत्ती भर भी शिथिलता मत आने दीजिए, पर रहिए कमलपत्र की तरह। राजा जनक की तरह कर्मयोगी बनिए। अनासक्त रहिए। सर्वत्र आत्मीयता की दृष्टि से देखिए। अपनी महानता का अनुभव कीजिए और गर्व के साथ सिर ऊंचा उठाकर कहिए- सोअहम, अर्थात वह मैं हूं।

आत्मज्ञान द्वारा आप इहलोक व परलोक को परिपूर्ण आनंदमय बना सकते हैं। मृत्यु फिर आपको दुख नहीं देगी। वरन एक खेल प्रतीत होगी। आप ऊंचे उठेंगे और महान उद्वेश्य को प्राप्त कर पायेंगे। मृत्यु की तैयारी के लिए आज से ही आत्मा के विशुद्ध स्वरूप का चिंतन आरंभ कर देना चाहिए। अपनी महानता का ज्ञान होते ही माया-मोह के सारे बंधन टूटकर गिर पड़ेंगे।-आचार्य डॉ. प्रदीप द्विवेदी ‘रमण’