आस्था और शौर्य का महापर्व बैसाखी

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Published By Deepak Mishra
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अशोक सूरी.... : प्राचीन काल से भारत एक कृषि प्रधान देश तो है ही, लेकिन साथ-साथ भारत एक उत्सव प्रधान देश भी है। भारत एक विविध संस्कृतियों का देश है, जहां हर ऋ तु अपने साथ एक नया उत्साह और उमंग लेकर आती है। भारत में अधिकतर पर्व किसी न किसी फसल की तैयारी के समय मनाए जाते हैं, इसका कारण उत्सव के समय का कालखंड तो होता ही है, साथ में पर्व पर खर्च करने के लिए पर्याप्त मात्रा में संसाधन और धन भी परिवारों के पास उपलब्ध हो जाता है। गेहूं की फसल तैयार होते ही होली का पर्व आ जाता है और खरीफ की तैयारी पर दीपावली पर्व आ जाता है। पंजाब में वैसे तो रबी की फसल जल्दी तैयार हो जाती है, परन्तु गेहूं पूरी तरह कट कर चैत्र के अंत तक किसानों के घर पर पहुंच जाता है और उसकी कमाई घर पर आने लगती है। इसी ऋ तु के साथ जुड़ा है- पंजाब का प्रमुख पर्व बैसाखी। 

जट्टा आई बैसाखी

पंजाब का किसान जब अपनी गेहूं की फसल की सुनहरी बालियों को लहलहाते हुये देखता है तो उसका मन मयूर खुशी से भर जाता है, और फिर पंजाबियों को तो उत्सव मनाने का मौका चाहिए। ‘जट्टा आई बैसाखी’ के उद्धघोष के साथ ढ़ोल की थाप पर हर पंजाबी के कदम भांगड़ा और गिद्दा के बोल पर कदम ताल करने लगते हैं, जो इस पर्व की खुशी का जीवन चित्रण है। बैसाखी पर्व ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार करता है। पंजाब एवं हरियाणा में यह पर्व केवल एक तिथि मात्र नहीं है, अपितु किसान की मेहनत के फलने और विश्वास के पुर्नजन्म का उत्सव होता है। धार्मिक दृष्टि से बैसाखी का दिन प्रतिवर्श 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। इस दिन हिन्दू नव वर्श की पहली संक्रांति भी होती है, और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। परंतु पंजाब में बैसाखी का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। सन् 1699 में इसी दिवस को सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविन्द जी ने आनन्दपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी।

सिख इस दिवस को ‘साजना’ दिवस के रूप में मनाते हैं। इसी दिन श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ने ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाकर पंच प्यारों को अमृत छकाया और अन्याय के विरूद्ध लड़ने के लिये एक वीर समुदाय को जन्म दिया जिसे गुरु जी ने ‘खालसा’ नाम दिया और इसी के साथ ‘राज करेगा खालसा’ का अमर संदेश दिया। इसी दिवस को दशमेश पिता गुरु गोविन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की। आज का सिख समुदाय इसी खालसा पंथ का विस्तृत रूप है। गुरु जी ने पंज प्यारों को अमृत छकाकर पंज प्यारों की पदवी और अमर सूत्र दिया। गुरु गोविन्द सिंह जी ने इस अवसर पर स्वयं भी पंज प्यारों से अमृत छककर यह सिद्ध किया कि गुरु और चेले में कोई अंतर नहीं है। उन्होंने कहा था- ‘आपे गुरु चेला’ अर्थात वह स्वयं गुरु भी हैं और स्वयं चेला भी। गुरु गोविन्द सिंह जी पंथ के दसवें एवं अंतिम मानव शरीर धारी गुरु थे। इसके पश्चात् गुरु ग्रंथ साहब को ही गुरु की पदवी पर रखा गया।

वाहे गुरु जी का खालसा वाहे गुरु जी की फतह

इसका तात्पर्य है कि यह खालसा पंथ वाहे गुरु जी का है, अतः इसकी सदैव विजय निष्चित है। गुरु जी ने सभी खालसा अनुयायीओं को एक विषेश पहचान दी, जिसे पाँच ककार (कड़ा, किरपान, कछैरा, कंघा और केष) कहा गया। आज भी सिख पंथ के लोग गुरु जी के इन पांच आदेश को धारण करते हैं। गुरु जी ने सभी सिखों को सिंह बताया और अपने नाम के आगे सिंह लगाने तथा महिलाओं को कौर लगाने का आदेष दिया। यही आदेश पंथ में समानता और समरसता का प्रतीक बना। आज सिखों के उत्सवों के अवसर पर निकलने वाले नगर कीर्तन में पंज प्यारे केशरिया बाना पहने सबसे आगे आगे चलते हैं। आज हर गुरुद्वारे में कीर्तन, अरदास और लंगर का आयोजन नियमित रूप से होता है। पंजाब की लोक संस्कृति इस दिन अपने चरम पर होती है। ढोल की थाप पर झूमते युवक युवतियां रंग बिरंगे वस्त्रों और उत्साह से भरा वातावरण हर किसी को अपनी ओर आयोजित करता है।

आशा और नवचेतना की प्रेरणा

बैसाखी के अतिरिक्त भारतीय इतिहास में यह 13 अप्रैल का दिवस कुछ अन्य घटनाओं के लिए भी विशेष है। इसी दिन गौतम बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ था। इसी दिन स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की थी। बैसाखी का पर्व हमे अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान रहना सिखाता है और साथ ही एकता, भाईचारे और मानवता का संदेश देता है। गुरु के लंगर में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता सभी एक ही पंक्ति में गुरु का प्रसाद छकते हैं। आज के समय में जब समाज कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। बैसाखी का पर्व हमें सकारात्मकता, आशा और नवचेतना की प्रेरणा देता है।