आस्था का अद्भुत शिवधाम 

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Published By Anjali Singh
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प्राणी के निर्माण में शामिल पांच तत्वों अग्नि, वायु, पृथ्वी, जल और आकाश का एक जगह मिलन। हमेशा जलती अखंड ज्योति और जल मानसरोवर। ये सभी उस परालौकिक शक्ति की उपस्थिति की अनुभूति करा रहे हैं, जिस शक्ति से पूरा ब्राह्मांड संचालित हो रहा है। ये अलौकिक शक्ति श्रद्धालुओं के लिए निराकार भी है और साकार भी। ये शक्ति मानव से लेकर सभी भूमिचर, जलचर और वायुचर की संरक्षक है। यही वजह है कि श्रद्धालु इन्हें ‘पशुपति नाथ’ के रूप में पूजते हैं। हम बात कर रहे हैं बरेली में पीलीभीत बाइपास रोड स्थित श्रीपशुपति नाथ जगमोहनेश्वर नाथ मंदिर की, जो नेपाल के काठमांडु स्थित पशुपति नाथ मंदिर से प्रेरित होकर इस ‘नाथ नगरी’में बना है। वर्ष 2001 में बना यह मंदिर बरेली के सात नाथ मंदिरों में शामिल है।

इस मंदिर का निर्माण शिव उपासक 70 साल के जगमोहन सिंह ने कराया है, जो कभी शहर के बड़े बिल्डर हुआ करते थे। वह बताते हैं कि स्वप्न में शिवजी ‘जटाशंकर’ के रूप में उन्हें दिखे थे। इस दौरान उनसे उनकी वार्ता भी हुई थी और उन्होंने उन्हें रुद्राभिषेक की पूरी प्रकिया सिखाई थी। तब से आज तक इस मंदिर पर निरंतर रुद्राभिषेक हो रहा है। मंदिर के गर्भ गृह में नर्मदेश्वर शिवलिंग व बाहर 108 शिवलिंग स्थापित हैं। दक्षिण में कालभैरव हैं, तो उत्तर में कैलाश पर्वत है। यहां बने सरोवर को मानसरोवर नाम दिया गया है। कैलाश पर्वत पर 1101 नर्मदेश्वर शिवलिंग और इसकी चोटी पर मां गौरी व भगवान शंकर और उनके पुत्रों भगवान गणेश व भगवान कार्तिकेय की मूर्ति स्थापित है। पूर्व दिशा में शनि शिला की स्थापना की गई है। यहां पूरे विधि-विधान से यज्ञशाला का निर्माण किया गया है, जिसमें पदम यज्ञकुंड शामिल है। शिव परिवार के साथ भगवान लक्ष्मी नारायण की भी मूर्ति है। सभी कार्य बद्रीनाथ मठ के जगत गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के निर्देशन में कराया गया था। - रमेश चंद्र,वरिष्ठ पत्रकार

मुस्लिम समाज के लोग करते हैं मंदिर की सुरक्षा

मंदिर के चारों ओर मंदिर की भूमि पर ही प्रवेश मार्ग बने हैं। मार्ग के चारों ओर पचास फीसदी से ज्यादा आबादी मुस्लिम समाज की है, जो हमेशा मंदिर की सुरक्षा को तैयार रहती है। मंदिर निर्माण की शुरुआत कराने वाले लतीफ वर्तमान में मंदिर के केयरटेकर की भूमिका में हैं। उनके पुत्र भी साथ में मंदिर सेवा में लगे रहते हैं। मंदिर में भोजन बनाने के लिए दो कर्मचारी तैनात हैं, जिसमें एक पारंपरिक पुजारी परिवार से तो दूसरा जाटव परिवार से हैं।

सैन्य अधिकारी के धक्के से मिली मंदिर निर्माण की प्रेरणा

जगमोहन सिंह को इस मंदिर के निर्माण की प्रेरणा काठमांडु के पशुपति नाथ मंदिर से उस वक्त मिली, जब वहां सैन्य शासन के दौरान वहां के मंदिर की पूरी व्यवस्था सैन्य प्रशासन के हाथ में थी। रुद्राभिषेक कराने पहुंचे जगमाेहन को एक सैन्य अधिकारी ने धक्का दे दिया था। इस दौरान वह जमीन पर गिर गए थे। हालांकि, वह चोटिल नहीं हुए थे। उस सैन्य अधिकारी ने उनसे बाद में क्षमा भी मांगी थी और रुद्राभिषेक करने को कहा था, पर जगमोहन ने संकल्प लेते हुए कह दिया था कि वह भोले नाथ को लेकर अब बरेली वापस लौटेंगे और काठमांडु की तर्ज पर यहां भी पशुपति नाथ मंदिर का निर्माण कराएंगे।

पांच सौ रुपये से हुई थी मंदिर निर्माण की शुरुआत

इस मंदिर की शुरुआत पांच सौ रुपये से हुई थी। शिव उपासक जगमोहन ने यह रकम अपनी बिल्डर कंपनी में कार्यरत दो मजदूरों लतीफ अंसारी और नबी जान को दी थी और इस रकम से सरिया, सीमेंट और बजरी लाने को कहा था। इससे ‘बीम’ बनकर तैयार कराई गई थी। मजदूरों ने उन्हें सलाह दी थी कि उनके कहने पर मंदिर निर्माण के लिए करोड़ों रुपये आ सकते थे, पर उन्होंने किसी का सहयोग लेने से मना कर दिया था। कुछ समय बाद उनकी कंपनी के व्यापार में फंसी कई करोड़ रकम उन्हें मिल गई, तो उस रकम से पूरा मंदिर तैयार कराया गया।

शिवरात्रि पर होता है 11 दिन का रुद्राभिषेक

इस मंदिर पर हर साल 11 दिन का रुद्राभिषेक, रुद्र महायज्ञ, पीतांबरा महायज्ञ, अष्टलक्ष्मी महायज्ञ होता है। यहां बरेली के साथ ही आस-पास के जिलों के श्रद्धालु भी आते हैं। दूसरे दिन भंडारे की व्यवस्था की जाती है। इसी दिन मंदिर का वार्षिक महोत्सव भी मनाया जाता है। यहां आश्रम बनाने का भी प्रस्ताव है, इसके लिए वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार डॉ.   अरुण कुमार सक्सेना की ओर से मुख्यमंत्री को पत्र लिखा गया है।