संयम और संस्कार

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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संयम, अपने आचार, व्यवहार, वाणी और कर्म पर नियंत्रण रख पाने की क्षमता है। इसका मुख्य घटक है धैर्य, जो हमें हमारे अपने संस्कारों से मिलता है। अब बात करते हैं संस्कार की, जिसका अर्थ है कि विभिन्न परिवेशों में विपरीत परिस्थितियां होते हुए भी हम किस प्रकार व्यवहार करते हैं। अगर संयम रखने के लिए हमें संस्कारों से प्रेरणा मिलती है, तो संस्कारों का पालन करने में संयम सहायक होता है।  ये संस्कार हमारे अपने अंदर ही बसते हैं।

हमारे बाल्यकाल से ही जो कुछ भी हम अपने परिवार व आस-पास के सामाजिक परिवेश में लोगों को विभिन्न परिस्थितियों में जैसी प्रतिक्रियाएं करते देखते हैं, उन सभी का आकलन हमारा अंतर्मन निरंतर करता रहता है। उसी आकलन का निष्कर्ष हमारे स्वयं के आचरण और व्यवहार में परिलक्षित होता है। यही कहलाते हैं हमारे संस्कार। इस तरह यह सिद्ध हुआ कि व्यक्ति के संस्कार उसके परिवार, सामाजिक परिवेश और जीवनशैली पर निर्भर करते हैं।

अधिकांश माता-पिता की चाहत होती है कि वह उनके बच्चों के माथे पर शिकन न आने दें। वो अपने बच्चों की इच्छाओं की पूर्ति तुरंत करना चाहते हैं। उनको लगता है कि यही अपने बच्चों के प्रति उनके असीमित प्रेम का पैमाना है। उनका मानना है कि संयम और धैर्य जैसे शब्द बच्चों के लिए नहीं बने हैं। इसलिए वो बच्चों को अपनी इच्छाओं पर संयम रखना नहीं सिखाते हैं। यही बच्चे बाल्यकाल के बाद जब किशोरावस्था में पहुंचते हैं, तो अपने विद्यालय या अन्य सामाजिक समूहों में जरा सी भी प्रतिकूल परिस्थिति आने पर संयम और मर्यादा पूर्वक आचरण नहीं कर पाते तो कहा जाता है कि आज कल के बच्चों में संस्कारों की कमी है। प्रश्न उठता है कि   संस्कारों में ये कमी आई कहां से? उत्तर है कि उनके प्रथम गुरुजन-उनके माता-पिता ने ये गुण सीखने का मौका ही नहीं दिया।

युवावस्था में पहुंचते-पहुंचते ये समस्या और भी उग्र हो चुकी होती है। अधिकांश युवा किसी भी अप्रिय और प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करने में स्वयं को अक्षम पाते हैं। अक्सर धैर्य और विवेक पूर्ण निर्णय लेना उनको मुश्किल लगने लगता है। यही कारण है कि छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति निरंतर बढ़ती जा रही है। जीवन में आगे बढ़ने पर व्यावसायिक एवं वैवाहिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करने में भी कठिनाई आने लगी है। 

धैर्य के साथ समझौता करने की आदत न होने से साझेदारियां टूट रही हैं, तलाकों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ऐसे समाचारों को देख-सुन कर आजीवन विवाह बंधन में न बंधने का निर्णय लेने वाले युवक-युवतियों का प्रतिशत भी तेजी से बढ़ रहा है, जो कि हमारे सामाजिक ढांचे के लिए एक चेतावनी है। एक कहावत है कि ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ आवश्यकता है कि हम अभी भी चेत जाएं और माता-पिता के रूप में अपने दायित्वों को समझ कर अपनी संतानों को जिम्मेदार, संयमी और सुसंस्कृत नागरिक बनने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें।

बाल्यकाल से ही उनकी हर जिद पूरी करने के बजाय आवश्यक और अनावश्यक में अंतर करना सिखाएं, इच्छाओं की पूर्ति के लिए धैर्य के साथ इंतजार करना सिखाएं। असंयमित व्यवहार करने पर शांति से सही तरीका बताएं। घर हो या बाहर, बच्चों के सामने बड़ों का संयमित व्यवहार ही उन्हें सही संस्कार सीखने  के लिए सहायक होता है।  अपनी संतान को सुसंस्कृत नागरिक के रूप में बड़ा करना अभिभावकों का नैतिक दायित्व है।  इसीलिए कहा गया है कि संतान का सही तरीके से पालन करना एक तपस्या है।


शिवा श्रीवास्तव