सामयिकी : भारत के कुपोषण मुक्त होने में हैं कई चुनौतियां

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Published By Virendra Pandey
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अल्पना कुमारी
अल्पना कुमारी,एक्टिविस्ट

 

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में बच्चों और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है, जिसका समाधान खोजने के उद्देश्य से साल 1975 में केंद्र सरकार ने समेकित बाल विकास सेवा योजना की शुरुआत की थी, इसके अंतर्गत आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थापना की गई, जिसका मकसद था कि छह वर्ष तक के बच्चों, गर्भवती और धात्री महिलाओं को पोषण, स्वास्थ्य सेवाएं और प्रारंभिक शिक्षा एक ही स्थान पर उपलब्ध कराई जा सके। बहुत हद तक यह योजना सफल भी रही है, लेकिन पिछले 50 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हम यह दावे के साथ नहीं कह सकते कि यह योजना शत-प्रतिशत सफल रही है।

इस समय देशभर में लगभग 13.9 लाख आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं, जो दुनिया की सबसे बड़ी प्रारंभिक बाल देखभाल और पोषण व्यवस्था मानी जाती है। यह करीब आठ करोड़ से अधिक लाभार्थियों तक सेवाएं पहुंचा रही है। इस योजना के तहत छह प्रमुख सेवाएं प्रदान की जाती हैं, जिनमें पूरक पोषण, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण, पोषण एवं स्वास्थ्य शिक्षा और जरूरत पड़ने पर रेफरल सेवाएं शामिल हैं। इन सेवाओं के माध्यम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया कि बच्चे जीवन के पहले छह वर्षों में शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ विकसित हों और गर्भवती महिलाओं को उचित पोषण मिल सके।

भारत में कुपोषण की समस्या लंबे समय से गंभीर रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, आज भी देश में 35.5 प्रतिशत बच्चे कम कद, 32.1 प्रतिशत कम वजन वाले और 19.3 प्रतिशत अत्यधिक दुबले पाए जाते हैं। ये आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि समस्या अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन पिछले दशकों में इसमें कुछ सुधार अवश्य हुआ है। यदि पिछले तीन दशकों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि आंगनबाड़ी प्रणाली ने कुपोषण की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार लाने में भूमिका निभाई है। वर्ष 1992-93 में जहां बच्चों में कम कद की दर लगभग 52 प्रतिशत थी, वहीं 2019-21 तक यह घटकर 35.5 प्रतिशत रह गई। इसी प्रकार कम वजन वाले बच्चों की संख्या 53.4 प्रतिशत से घटकर 32.1 प्रतिशत तक पहुंची है।

इन उपलब्धियों के बावजूद चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कई अध्ययनों से पता चलता है कि आंगनबाड़ी सेवाओं का लाभ सभी जरूरतमंद लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है। देश में आंगनबाड़ी सेवाओं का उपयोग बढ़ा है, लेकिन 2016 से 2021 के बीच कुपोषण में जो कमी आई, उसमें आंगनबाड़ी सेवाओं का योगदान लगभग 9-12 प्रतिशत ही माना गया है। जो यह दर्शाता है कि योजना ने सकारात्मक प्रभाव डाला है, लेकिन इसे और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

हाल के वर्षों में सरकार ने आंगनबाड़ी व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए कई नई पहलें शुरू की हैं। सक्षम आंगनबाड़ी और पोषण 2.0 योजना के तहत देशभर में लगभग दो लाख आंगनबाड़ी केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित करने की प्रक्रिया चल रही है। इनमें इंटरनेट सुविधा, डिजिटल उपकरण और स्वच्छ पेयजल जैसी व्यवस्थाएं शामिल की जा रही हैं। इसके अतिरिक्त, मिनी आंगनबाड़ी केंद्रों को पूर्ण केंद्रो में परिवर्तित करने की भी योजना बनाई गई है, जिससे सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होने की उम्मीद है। 

वास्तव में, आंगनबाड़ी केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के स्वास्थ्य और पोषणयुक्त भविष्य की आधारशिला है। पिछले कुछ दशकों में इस प्रणाली ने कुपोषण को कम करने और बच्चों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 

(यह लेखिका के निजी विचार हैं)

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