World Dance Day : नृत्य, मन के भावों का अभिनीत गीत 

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Published By Anjali Singh
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नृत्य मनुष्य के उल्लास का प्रत्यक्ष भावात्मक प्रदर्शन है। जब मन उल्लास से भर उठता है, तो शारीरिक चेष्टाएं उसकी अभिव्यक्ति नृत्य के रूप में करती हैं। इस प्रकार नृत्य मन के भावों का अभिनीत गीत है। यदि सूक्ष्मता से देखें तो प्रकृति का हर तत्व खुशी में नृत्य करता जान पड़ता है। बरसते पानी में महकती धरती पर सिर्फ मोर ही नहीं नाचते, पेड़ों की डालियां भी वर्षा की बूंदों के साथ झूमती नजर आती हैं।

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प्रकृति से इतर अपनी सभ्यता और संस्कृति के विकास क्रम में मनुष्य ने नृत्य की लय और गति को विभिन्न शैलियों में बांधकर नृत्य के अनेक प्रकारों को सृजित किया है। भारत में बहुल सांस्कृतिक विविधता में विभिन्न नृत्य शैलियां विकसित हुईं हैं। इन नृत्य शैलियों को शास्त्रीय नृत्य और लोकनृत्य की दो श्रेणियों में रख सकते हैं। यह दोनों ही शैलियां भारतीय संस्कृति, इतिहास और सामाजिक जीवन के जीवंत प्रतीक हैं।– डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री, निदेशक, रुहेलखंड शोध संस्थान, शाहजहांपुर

भारत में लोक नृत्य की परंपरा अत्यंत प्राचीन, विविधतापूर्ण और जीवंत रही है, जो देश की सांस्कृतिक बहुलता का सशक्त प्रतीक है। यह परंपरा विभिन्न क्षेत्रों, जातीय समूहों और सामाजिक समुदायों के जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। भारत के प्रत्येक प्रदेश- जैसे पंजाब, राजस्थान, गुजरात और असम की अपनी विशिष्ट लोकनृत्य शैलियां हैं, जो वहां की भौगोलिक, ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करती हैं।

लोक नृत्यों का उद्भव मुख्यतः कृषि-आधारित समाज से हुआ, जहां फसल कटाई, वर्षा, विवाह और धार्मिक उत्सवों के अवसर पर सामूहिक रूप से नृत्य किया जाता था। उदाहरण के लिए, पंजाब का भांगड़ा फसल की खुशी का प्रतीक है, जबकि गुजरात का गरबा देवी-उपासना से जुड़ा हुआ है। इन नृत्यों में स्थानीय लोकगीत, वाद्य यंत्र और पारंपरिक वेशभूषा का महत्वपूर्ण स्थान होता है। आधुनिक समय में भी लोक नृत्य अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं और सांस्कृतिक उत्सवों व मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से इन्हें नया आयाम मिला है।

कथक नृत्य

कथक भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपराओं में एक प्रमुख और विकसित शैली है, जिसकी ऐतिहासिक जड़ें प्राचीन कथावाचन परंपरा से जुड़ी हैं। ‘कथक’ शब्द ‘कथा’ से बना है और प्रारंभ में कथक वे कलाकार थे, जो मंदिरों और जनसभाओं में धार्मिक कथाएं प्रस्तुत करते थे। यह शैली उत्तर भारत, विशेषतः उत्तर प्रदेश में विकसित हुई तथा लखनऊ और जयपुर घरानों के माध्यम से समृद्ध हुई। इसके विकास को तीन चरणों में देखा जा सकता है- मंदिर परंपरा, दरबारी प्रभाव और आधुनिक मंचीय स्वरूप। भक्ति काल में इसमें कृष्ण लीलाओं का वर्णन प्रमुख रहा, जबकि मुगल काल में इसमें नजाकत, श्रृंगार और तकनीकी जटिलता का समावेश हुआ। कथक की विशेषता उसकी भाव-भंगिमा, ‘अभिनय’, तेज ‘तत्कार’ और घूमरदार ‘चक्कर’ हैं, जो इसे विशिष्ट बनाते हैं।

लिल्ली घोड़ी

लिल्ली घोड़ी या कठ घोड़वा नृत्य उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों में प्रचलित एक पारंपरिक लोकनृत्य है। यह नृत्य विवाह, मेलों और उत्सवों में प्रस्तुत किया जाता है। ऐतिहासिक रूप से इसका संबंध वीरता और घुड़सवारी की परंपरा से है। नर्तक लकड़ी या बांस से बने कृत्रिम घोड़े को कमर में बांधकर रंग-बिरंगे वस्त्रों में नृत्य करते हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो वे घोड़े पर सवार हों। यह नृत्य मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक संदेशों का भी माध्यम रहा है।

कजरी

कजरी भारतीय लोकसंगीत की एक भावप्रधान शैली है, जिसका उद्गम उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर और वाराणसी क्षेत्र में माना जाता है। सावन-भादों की वर्षा ऋतु में गाए जाने वाले कजरी गीत विरह, प्रेम और प्रकृति के सौंदर्य को अभिव्यक्त करते हैं। जब इन गीतों के साथ नृत्य किया जाता है, तो यह एक संपूर्ण सांस्कृतिक अनुभव बन जाता है। स्त्रियां समूह में झूला झूलते हुए या आंगन में गोल घेरा बनाकर कजरी गाती और नृत्य करती हैं। यह शैली ग्रामीण जीवन की सहज अभिव्यक्ति है, जिसमें भाव और लय का सुंदर संतुलन दिखाई देता है।

मयूर नृत्य

मयूर नृत्य भारतीय लोक और शास्त्रीय परंपराओं का एक मनोहारी रूप है, जो विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र में प्रचलित है। इसका संबंध कृष्ण की लीलाओं और प्रकृति-प्रेम से जोड़ा जाता है। वर्षा ऋ तु में मोर के नृत्य से प्रेरित होकर यह शैली विकसित हुई। कलाकार मोर के पंखों से सुसज्जित वेशभूषा पहनकर उसकी चाल और मुद्राओं का अनुकरण करते हैं। बांसुरी, ढोलक और मंजीरा जैसे वाद्य यंत्र इसकी लयात्मकता को और अधिक आकर्षक बनाते हैं।

नौटंकी

नौटंकी उत्तर भारत की एक लोकप्रिय लोकनाट्य परंपरा है, जिसमें संगीत, गायन, संवाद और नृत्य का समन्वय होता है। इसका विकास विशेषतः उत्तर प्रदेश में हुआ। नौटंकी में नृत्य कथा-वाचन का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसमें कथक की छाप स्पष्ट दिखाई देती है, विशेषकर चक्कर और भाव-भंगिमा में। ढोलक, नगाड़ा और हारमोनियम की ताल पर कलाकार नृत्य करते हुए कथा को जीवंत बनाते हैं।  नौटंकी में सम्मिलित नृत्य स्वरूप विविध लोक और शास्त्रीय शैलियों से प्रभावित होते हैं। इनमें कथक की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, विशेषकर उसकी घूमरदार चाल, चक्कर और भाव-भंगिमा में। इसके साथ ही लोकनृत्य की सरलता और सहजता भी इसमें समाहित रहती है, जिससे यह आम जनमानस के लिए अधिक ग्राह्य बन जाता है। नौटंकी के नृत्य में अभिनय (अभिनयात्मक नृत्य) का विशेष स्थान होता है। कलाकार गीतों और संवादों के बीच नृत्य करते हुए कथा के भावों को अभिव्यक्त करते हैं। स्त्री पात्रों की भूमिका, चाहे पुरुष कलाकार निभाएं या स्त्रियां, उसमें लयात्मकता और नज़ाकत का समावेश होता है। नृत्य की गतियां अधिक जटिल न होकर दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करने वाली होती हैं।

छपेली

छपेली नृत्य उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का एक लोकप्रिय लोकनृत्य है, जो वसंत ऋ तु और होली जैसे उत्सवों पर किया जाता है। इसमें स्त्री-पुरुष युगल के रूप में भाग लेते हैं और लोकगीतों की धुन पर संवादात्मक शैली में नृत्य करते हैं। इसमें श्रृंगार, हास्य और सामाजिक जीवन के विविध रंग दिखाई देते हैं। हुड़का और मंजीरा जैसे वाद्य यंत्र इसकी लय को सजीव बनाते हैं।

पाय डंडा

पाय डंडा नृत्य उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में प्रचलित एक ऊर्जावान लोकनृत्य है। यह नृत्य मुख्यतः फसल कटाई, मेलों और धार्मिक अवसरों पर किया जाता है। इसमें डंडों का तालबद्ध टकराव वीरता और समन्वय का प्रतीक होता है। इसका संबंध प्राचीन युद्धाभ्यास और शारीरिक कौशल से भी जोड़ा जाता है।

जोगिनी नृत्य

जोगिनी नृत्य उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्र की लोकसंस्कृति का एक आध्यात्मिक रूप है। यह देवी-उपासना और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ा हुआ है। इस नृत्य में नर्तक भावावेश में आकर नृत्य करते हैं, जिससे दैवीय अनुभूति का संचार होता है। ढोल, दमाऊ और रणसिंघा जैसे वाद्य यंत्र इसकी ऊर्जा को बढ़ाते हैं। इस प्रकार भारत के लोक नृत्य न केवल मनोरंजन के साधन हैं, बल्कि वे देश की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक जीवन और ऐतिहासिक परंपराओं का सजीव प्रतिबिंब भी प्रस्तुत करते हैं।