संपादकीय: यात्रा से संदेश 

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Published By Monis Khan
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वर्तमान में भारत-अमेरिका संबंध अभूतपूर्व सामरिक निकटता और समानांतर असहजताओं, दोनों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का भारत आना कई लिहाज से महत्वपूर्ण है। फिलहाल अब तक की उनकी यात्रा और कूटनीति का मूल उद्देश्य दिखा है कि टैरिफ, वीजा, इमिग्रेशन, पाकिस्तान, चीन, आतंकवाद जैसे गंभीर सवालों के जवाब भले न मिलें, पर अमेरिकी हितों से जरा भी समझौता किए बिना आपसी भरोसा बनाए रखना है। 

रूबियो ने कूटनीतिक शिष्टाचार दर्शाते हुए भारत के प्रति अपने सार्वजनिक संदेशों में लगातार सकारात्मकता दिखाई। ‘आई लव इंडिया’ जैसे भावनात्मक वाक्य उस रणनीतिक यथार्थ की स्वीकृति है कि अमेरिका के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत चीन के संतुलनकारी साझेदार के रूप अपरिहार्य है। वे जानते हैं कि जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत की भागीदारी के बिना अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति अधूरी है। इसके बावजूद इस रिश्ते में सहजता अधूरी लगती है। 

अमेरिकी राजनीति में बढ़ते संरक्षणवाद, ट्रंप-युगीन ‘अमेरिका फर्स्ट’ मानसिकता और भारतीय पेशेवरों पर बढ़ती वीजा-सख्ती ने भारतीय मध्यमवर्ग और प्रवासी समुदाय को बेहद चिंतित किया है। नस्लीय टिप्पणियों और एंटी-इमिग्रेशन राजनीति ने भी असहजता बढ़ाई है। ऐसे में रूबियो का सबसे बड़ा दायित्व यह भरोसा दिलाना है कि भारतीय प्रतिभा को अमेरिका में संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा। भारत के लिए यह केवल प्रवासी प्रश्न नहीं, बल्कि सेवा-निर्यात, टेक्नोलॉजी और वैश्विक प्रतिभा-आधारित अर्थव्यवस्था का मामला है। व्यापार और टैरिफ विवाद भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। 

अमेरिका भारत से बाजार पहुंच और शुल्क में नरमी चाहता है, जबकि भारत अपनी घरेलू उद्योग और कृषि सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। रूबियो की भूमिका यहां मध्यस्थ की नहीं, बल्कि ‘संतुलन निर्माता’ की हो सकती है। वे यह समझते हैं कि भारत को चीन-विरोधी रणनीतिक साझेदार बनाए रखना है, तो केवल दबाव की नीति पर्याप्त नहीं होगी। ऊर्जा सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, रक्षा निर्माण और महत्वपूर्ण खनिजों में सहयोग बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा है। 

पाकिस्तान को लेकर रूबियो का रुख है कि किसी भी देश से अमेरिकी संबंध भारत के हितों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। बयान भारत के लिए आश्वस्तकारी अवश्य है, परंतु भारत यह भी जानता है कि वाशिंगटन इस्लामाबाद से दूरी नहीं बना सकता। अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया और आतंकवाद-रोधी रणनीतियों में पाकिस्तान की उपयोगिता अभी समाप्त नहीं हुई है, इसलिए भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अमेरिका से आतंकवाद पर स्पष्ट और व्यावहारिक सहयोग सुनिश्चित करे, महज बयानबाजी नहीं। 

भारतीय विदेश मंत्री का ‘इंडिया फर्स्ट’ दृष्टिकोण भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। साफ संकेत है कि भारत अब किसी गुट की परछाईं नहीं बनने वाला। रूस से संबंध हों, ईरान से ऊर्जा खरीदी या ग्लोबल साउथ की राजनीति— भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता नहीं छोड़ेगा। रूबियो भी संभवतः यह समझ चुके हैं कि नया भारत साझेदार तो बन सकता है, पर आश्रित नहीं। भारत-अमेरिका संबंध अब भावनात्मक मित्रता नहीं, बल्कि परस्पर हितों की परिपक्व साझेदारी हैं। इसमें सहयोग भी होगा, मतभेद भी। यदि संवाद और विश्वास बना रहा, तो यह संबंध 21वीं सदी की सबसे निर्णायक वैश्विक साझेदारियों में बदल सकता है। इस यात्रा का यही सबसे बड़ा संदेश है।