संपादकीय: स्वागत योग्य सख्ती 

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Published By Monis Khan
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उत्तर प्रदेश में आए बिजली संकट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सख्त रुख स्वागत योग्य है। अधिकारियों को जवाबदेह बनाना, ब्रेकडाउन पर तत्काल सप्लाई बहाल करने के निर्देश देना और आपूर्ति व्यवस्था की समीक्षा करना, आवश्यक कदम हैं। शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता की परीक्षा ले रही घंटों की अघोषित कटौती, ट्रिपिंग, लो-वोल्टेज, ट्रांसफार्मरों के जलने और आपूर्ति बहाल होने में देरी, जिससे आम नागरिक, किसान, व्यापारी सभी परेशान हैं, उन्हें मुख्यमंत्री के इस  कदम से कुछ ढांढस बंधा है। पर महज सख्ती से इस गहरे संकट का समाधान कठिन है। 

प्रदेश में बिजली की मांग दशक भीतर तेजी से बढ़ती हुई, ढाई गुना से ज्यादा हो चुकी है और उपभोक्ताओं की संख्या भी दो गुना बढ़ गई है। भीषण गर्मी, एयर कंडीशनर और कूलरों के बढ़ते उपयोग और बढ़ते शहरीकरण ने बिजली खपत को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया है। आज यह खपत प्रतिदिन औसतन 653 मिलियन यूनिट तक पहुंचना यही कहता है। प्रदेश इससे पहले भी बिजली की भारी मांग पूरी कर चुका है, इसलिए आज इस मामले में जो व्यापक अव्यवस्था दिख रही है,  उसका कारण उत्पादन और उपलब्धता से अधिक वितरण और प्रबंधन व्यवस्था है। प्रदेश में तापीय बिजली उत्पादन 5,000 मेगावाट से बढ़कर 9,000 मेगावाट से अधिक पहुंच गया है, तो केंद्र और निजी स्रोतों से भी पर्याप्त बिजली उपलब्ध है, इसलिए समस्या ‘बिजली की कमी’ से अधिक ‘बिजली पहुंचाने की क्षमता’ की प्रतीत होती है। 

जर्जर ट्रांसफार्मर, पुरानी लाइनें, ओवरलोड फीडर और कमजोर पारेषण नेटवर्क संकट को बढ़ा रहे हैं। उपभोक्ता कम लोड का कनेक्शन लेकर वास्तविक उपयोग अधिक कर रहे हैं, जिससे ट्रांसफार्मरों पर दबाव असामान्य रूप से बढ़ रहा है। भीषण गर्मी इस तकनीकी कमजोरी को और उजागर कर रही है। समय पर ट्रांसफार्मर बदलने, लाइन उन्नयन, रख-रखाव और लोड आकलन में लापरवाही वर्षों से चली आ रही है। कई क्षेत्रों में लाइन लॉस और बिजली चोरी ने भी बिजली घरों के भ्रसटाचार ने भी व्यवस्था को कमजोर किया है। मानव संसाधन का टोटा अत्यंत गंभीर प्रश्न है। संविदा कर्मियों की छंटनी और सीमित तकनीकी गैंगों की व्यवस्था ने मरम्मत तंत्र को लगभग अपंग बना दिया है। इसके चलते कर्मचारी दबाव में हैं, जोखिम उठाकर काम कर रहे हैं और उपभोक्ता असहाय महसूस कर रहे हैं। पहले स्थानीय एसडीओ या अभियंता तक पहुंच संभव थी, अब शिकायत व्यवस्था अधिक केंद्रीकृत और निर्जीव हो गई है। जनता को समस्या के समाधान से अधिक ‘कोई सुनने वाला नहीं’ होने की पीड़ा है। उपभोक्ता और विभाग के बीच संवादहीनता भी जनाक्रोश का कारण बनी है। 

उत्तर प्रदेश की बढ़ती अर्थव्यवस्था और औद्योगिक आकांक्षाओं के लिए विश्वसनीय बिजली व्यवस्था कोई विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी आवश्यकता है। सरकार को अब तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर काम करना होगा। तत्काल तौर पर अतिरिक्त तकनीकी गैंग, मोबाइल ट्रांसफार्मर, स्थानीय शिकायत निवारण केंद्र और अस्पतालों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए विशेष व्यवस्था जरूरी है, जबकि दीर्घकालिक समाधान के लिए वितरण नेटवर्क का आधुनिकीकरण, स्मार्ट लोड प्रबंधन, पर्याप्त तकनीकी भर्ती और जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा अनिवार्य होगा। इस क्षेत्र में सरकार की असली कसौटी यही होगी कि अंतिम उपभोक्ता तक बिजली निर्बाध पहुंचे।