संपादकीय : अंतरिक्ष का नया अध्याय
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की वैज्ञानिक क्षमता और दूरदृष्टि का पर्याय रहा है, किंतु अब भारत ने एक नई ऐतिहासिक छलांग लगाई है। निजी कंपनी द्वारा विकसित स्वदेशी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम के सरकारी मॉडल से सार्वजनिक-निजी साझेदारी वाले नए व्यावसायिक युग में प्रवेश का उद्घोष है। यह उपलब्धि असाधारण है, क्योंकि अब भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में आ गया है, जहां निजी क्षेत्र केवल उपग्रह या पुर्जे नहीं बनाता, बल्कि स्वयं कक्षीय प्रक्षेपण की क्षमता रखता है। इसका अर्थ है कि भारत वैश्विक वाणिज्यिक प्रक्षेपण बाजार में अब केवल इसरो के भरोसे नहीं, बल्कि अनेक प्रतिस्पर्धी निजी कंपनियों के साथ उतर रहा है। यही परिपक्व अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की पहचान होती है।
कुछ महीने पहले गैलेक्सआई के 'मिशन दृष्टि' के अंतर्गत दुनिया के पहले ऑप्टोसार उपग्रह की सफलता ने यह संकेत दिया था कि भारतीय निजी कंपनियां कम लागत में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी विकसित कर सकती हैं। अब विक्रम-1 ने उस विश्वास को अगले स्तर पर पहुंचा दिया है। तय हुआ कि भारत निजी क्षेत्र के माध्यम से संपूर्ण अंतरिक्ष मूल्य-श्रृंखला—रॉकेट, उपग्रह, प्रक्षेपण और अंतरिक्ष सेवाओं में प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में पहुंच रहा है। विशेष रूप से पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों से प्राप्त दृश्य आंकड़ों का वैश्विक बाजार अत्यंत तेज़ी से बढ़ रहा है। उच्च गुणवत्ता वाले उपग्रह चित्र आज कृषि, बीमा, खनन, शहरी नियोजन, सीमा सुरक्षा, जल संसाधन, मौसम पूर्वानुमान तथा रक्षा जैसे क्षेत्रों की आधारभूत आवश्यकता बन चुके हैं। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में स्पेस-आधारित डेटा सेवाएं स्वयं प्रक्षेपण उद्योग से कहीं बड़ा आर्थिक अवसर बनेंगी। भारत की निजी कंपनियां यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ इन आंकड़ों का विश्लेषण जोड़ती हैं, तो वे वैश्विक डेटा-इंटेलिजेंस बाजार में भी महत्वपूर्ण स्थान बना सकती हैं।
2020 में केंद्र सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलने तथा इन-स्पेस जैसी संस्थागत व्यवस्था बनाने का परिणाम अब स्पष्ट दिखाई दे रहा है। आज देश में 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप सक्रिय हैं। कोई प्रक्षेपण यान विकसित कर रहा है, कोई उपग्रह, कोई प्रणोदन प्रणाली, तो कोई अंतरिक्ष-आधारित डेटा सेवाएं या रक्षा अनुप्रयोग विकसित कर रहा है। कई भारतीय कंपनियां विदेशी ग्राहकों के लिए भी उपग्रह और अंतरिक्ष प्रणालियां बना रही हैं। सरकार का लक्ष्य 2033 तक भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को लगभग 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने तथा निर्यात को 11 अरब डॉलर तक ले जाने का है।
यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी अवश्य है, किंतु निजी निवेश, वैश्विक मांग और इसरो की विश्वसनीयता इसे यथार्थवादी आधार प्रदान करती है। श्रीहरिकोटा के विस्तार तथा तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में दूसरे स्पेसपोर्ट का निर्माण भी इसी रणनीति का हिस्सा है। अधिक प्रक्षेपण स्थल उपलब्ध होने से निजी कंपनियों को समय, लागत और संचालन में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। गगनयान मिशन की संभावित सफलता इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में निवेशकों का विश्वास और बढ़ाएगी। भारत अब केवल अंतरिक्ष तक पहुंचने की नहीं, बल्कि अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, ऑर्बिटल अवसंरचना और गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण में दीर्घकालिक नेतृत्व की तैयारी कर रहा है। विक्रम-1 की उड़ान इसी भविष्य की पहली व्यावसायिक दस्तक है।
