संपादकीय: नए साल में नई परिभाषा
दुनिया की सबसे पुरानी भूगर्भीय संरचनाओं में शामिल अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने ही आदेश को वापस लेना यह संकेत है कि न्यायालय को प्रस्तुत परिभाषा और उसके दूरगामी पर्यावरणीय प्रभावों पर गंभीर शंकाएं उत्पन्न हुई हैं। यह घटनाक्रम बताता है कि अरावली जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को परिभाषित करने में जल्दबाजी और अधूरी वैज्ञानिक कसौटियां खतरनाक साबित हो सकती हैं। नया आदेश यह साबित करता है कि पिछला फैसला किंचित जल्दबाजी में लिया गया था।
अदालत ने स्वयं यह स्वीकारा कि नई परिभाषा से ‘संरचनात्मक विरोधाभास’ तो पैदा नहीं हो रहा, यह जांचना आत्यावश्यक है। अदालत की स्वीकारोक्ति बताती है कि सरकार का जवाब अंतिम सत्य मान लेने लायक भरोसेमंद नहीं थे। जिस नई परिभाषा को अदालत ने पहले स्वीकार किया था, वह पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक समिति ने प्रस्तुत की थी। उद्देश्य अरावली की रक्षा बताई गई थी, पर आरोप यह हैं कि उक्त परिभाषा के मानदंड, जैसे 100 मीटर की ऊंचाई- व्यावहारिक रूप से अरावली के बड़े हिस्से को संरक्षण से बाहर कर देते हैं। यदि समिति का उद्देश्य संरक्षण था, तो यह परिभाषा अपने परिणामों में विपरीत कैसे हो सकती है? लाजिमी है कि यह पुनर्विचार आवश्यक था।
राजस्थान में 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 के 100 मीटर से अधिक ऊंचे होने के दावे को मानने से 92 फीसद से अधिक पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हो जाएंगी। यह तथ्यात्मक स्थिति बताती है कि ऊंचाई-आधारित परिभाषा अरावली की वास्तविक भूगर्भीय और पारिस्थितिक निरंतरता को नज़रअंदाज़ करती हैं। नतीजा- अंधाधुंध खनन और रियल एस्टेट परियोजनाओं के लिए दरवाज़ा खुल सकता है। अरावली की प्रकृति ‘टुकड़ों में बंटी पहाड़ियों’ की नहीं, बल्कि एक जुड़े हुए पारिस्थितिक, प्राकृतिक तंत्र की है।
यदि पहाड़ियां 100 मीटर से ऊंची हों, पर 500 मीटर से अधिक दूरी पर हों, तब भी वे भूजल रिचार्ज, जैव-विविधता और जलवायु नियमन के साझा कार्य करती हैं। ऐसे में उन्हें अलग-अलग इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि एक सतत पारिस्थितिक तंत्र के रूप में देखना ही वैज्ञानिक दृष्टि से उचित है। ‘विनियमित’ या ‘सतत’ खनन की अवधारणा कागज़ पर आकर्षक लग सकती हैं, पर अरावली जैसे नाज़ुक क्षेत्र में कड़ी निगरानी के बावजूद इसके प्रतिकूल प्रभावों को नकारा नहीं जा सकता। ढलानों का कटाव, भूजल स्तर में गिरावट और जैव-विविधता का नुकसान दीर्घकाल में अपरिवर्तनीय हो सकता है।
एफएसआई द्वारा लंबे समय से अपनाया गया 3-डिग्री ढलान का मानदंड अधिक समावेशी और भू-आकृतिक वास्तविकताओं के करीब रहा है। इसके विपरीत, सरकार द्वारा सौंपी गई नई सूची में कई जिलों को संरक्षण क्षेत्र से बाहर कर दिया गया है, जिससे उन क्षेत्रों में पर्यावरणीय दबाव तेज़ी से बढ़ सकता है। अरावली उत्तर-पश्चिम भारत में रेगिस्तान बनने से रोकने, भूजल रिचार्ज करने और आजीविका बचाने की रीढ़ है, इसलिए इसे केवल ऊंचाई से नहीं, बल्कि उसके पर्यावरणीय, भूगर्भीय और जलवायु महत्व से परिभाषित किया जाना चाहिए।
