संपादकीय : चौथी अर्थव्यवस्था का अर्थ
साल के आखिरी दिन यह खबर अत्यंत उत्साहवर्धक रही कि हम साल बीतने से पहले जापान की 368 लाख करोड़ की जीडीपी को पीछे छोड़ 376 लाख करोड़ वाली विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बने और सरकार को उम्मीद है कि अगले तीन साल के भीतर हम जर्मनी की अर्थव्यवस्था को पछाड़ कर अमेरिका और चीन के बाद दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बन जाएंगे।
सरकार की तरफ से जारी एक आधिकारिक बयान में यह भी जानकारी दी गई कि महंगाई दर जो पहले चार से ऊपर थी घट कर एक फीसद से भी नीचे आ गई है और बेरोजगारी दर में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। देश की जीडीपी की विकास दर भी खासी ऊंची है। महंगाई बेहद कम, लोगों को काम और जीडीपी बढ़त पर, विदेशी मुद्रा भंडार भी भरा हुआ, यानी दौर वाकई ‘गोल्डिलॉक्स पीरियड’ है।
ये सरकारी दावे नये साल की शुरुआत करने के लिए शानदार उत्प्रेरक की तरह काम कर सकते हैं, साथ ही अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने इस बात को दोहराया है कि भारत की विकास दर आगे भी सात फीसदी से ज्यादा रहने से वह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बनी रहेगी। यानी इस साल हम इस दिशा में कुछ और नए प्रतिमान स्थापित करेंगे। यह ठीक है कि जापान लंबे समय से जनसंख्या घटने, कमजोर घरेलू मांग और कर्ज के बोझ तले है।
जर्मनी की अर्थव्यवस्था भी ऊर्जा संकट, औद्योगिक सुस्ती और यूरोप की समग्र मंदी के कारण लगभग ठहराव की स्थिति में है, सो हमारी रैंकिंग में परोक्षत: दूसरों का भी हाथ है। एक महत्वपूर्ण पहलू भी गौरतलब है, बड़ी अर्थव्यवस्था अधिकतर आम लोगों के बेहतर जीवन की गारंटी नहीं है। अच्छी सड़कें, आधुनिक परिवहन, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं, मुफ्त व प्रभावी शिक्षा, भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन, अपराध नियंत्रण और प्रदूषण से राहत- ये सब केवल जीडीपी के आकार से नहीं, बल्कि नीतिगत प्राथमिकताओं से तय होते हैं।
प्रति व्यक्ति आय का अंतर इसे साफ दर्शाता है। भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग दो लाख रुपये सालाना मान भी लें, तो जापान की प्रति व्यक्ति आय औसतन 40 लाख प्रतिवर्ष है, जर्मनी, अमेरिका में इससे भी अधिक है। यानी भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ेगी पर आम भारतीय विकसित देशों से पीछे रहेगा। मानव विकास सूचकांक में भारत अभी मध्यम श्रेणी में है, जबकि अमेरिका, जर्मनी और जापान शीर्ष पायदानों में हैं और चीन भी भारत से ऊपर है। स्पष्ट है कि आर्थिक रैंकिंग और मानव विकास रैंकिंग में सीधा संबंध नहीं होता।
कुल मिलाकर बड़ी अर्थव्यवस्था का असली अर्थ है, जन कल्याण के लिए अधिक संसाधन। यदि ये संसाधन शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और प्रदूषण नियंत्रण में नहीं लगे, तो आंकड़ों की चमक आम आदमी तक नहीं पहुंचेगी। यह बदलाव केवल जीडीपी का नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के जीवन में क्रांतिकारी सुधार का प्रतीक बने, इसके लिए विकास को समावेशी, रोजगार-प्रधान और मानव-केंद्रित बनाना होगा। तभी ‘चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था’ एक वास्तविक उपलब्धि कहलाएगी, न कि सिर्फ एक सांख्यिकीय मील का पत्थर।
