कभी एशिया की सबसे बड़ी कंपनी थी केमू

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Published By Anjali Singh
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उत्तराखंड के कुमाऊं में अंग्रेजों द्वारा मोटर मार्ग बनाने से पहले बैलगाड़ी ही यातायात का प्रमुख साधन हुआ करती थी । बैलगाड़ी वाले मार्ग प्रमुख रूप से तीन थे जिन्हें ' कोर्ट रोड ' कहा जाता था । 1911 में नैनीताल तक सड़क का निर्माण हुआ तो  1915 में हल्द्वानी से  नैनीताल के मध्य यातायात शुरु हुआ। 1920 में मोटर यातायात को अल्मोड़ा से रानीखेत तक बढ़ाया गया। 1921 से 1938 तक कुमाऊं में 13 मोटर कंपनियां पंजीकृत थी, जिनमें मुख्य रूप से हिल मोटर ट्रांसपोर्ट, हरवंश ट्रांसपोर्ट , फौंसिका ट्रांसपोर्ट, नैनीताल मोटर ट्रांसपोर्ट, कुमाऊं मोटर सर्विस कंपनी आदि थी। इन तेरह कंपनियों को आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण हानि उठानी पड़ती थी। अधिकतर कंपनियां घाटे में थी। 1939 में घाटे के कारण नैनीताल मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी डूब गई।-- दीपक नौगांई, शिक्षक

घाटे को देखते हुए इन सभी कंपनियों ने एकीकरण का निर्णय लिया और 1939 में कुमाऊं मोटर्स ऑनर्स यूनियन लिमिटेड ( केमू ) की स्थापना हुई। एक दौर में यह कंपनी एशिया की सबसे बड़ी निजी ट्रांसपोर्ट कंपनी मानी जाती थी। केमू की स्थापना में ट्रांसपोर्ट कंपनियों के मालिकों के अलावा कई स्थानीय लोगों का भी सहयोग था जिनमें गोविंद बल्लभ पंत प्रमुख थे। शुरुआत में केमू के महाप्रबंधक काठगोदाम निवासी एंग्लो इंडियन ईजेड फौंसिका थे। उन्होंने कंपनी को आगे बढ़ाने में काफी मेहनत की और नई बसों का बेड़ा जोड़कर कंपनी को एक नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। 

वे काठगोदाम स्थित फौंसिका स्टेट में रहा करते थे जहां कंपनी का ऑफिस भी था। बाद में उन्होंने अपनी जमीन स्कूल और चर्च के निर्माण हेतु दान में दे दी। देवीदत्त तिवारी केमू के पहले सचिव थे जबकि हरबंस सिंह और लाला बालमुकुंद  कंपनी के डॉयरेक्टर थे। बाद में यह कार्यालय काठगोदाम स्थित नरीमन भवन में स्थानांतरित कर दिया गया , जो आज भी वही से संचालित किया जा रहा है। यह भवन मुंबई से आए पासरी नरीमन द्वारा बनाया गया था। केमू  कार्यालय की दो शाखाएं रामनगर और टनकपुर में भी खोली गई।

कभी केमू कंपनी में 250 के आसपास वाहन थे। हजारों लोगों को केमू ने रोजगार दिया तो लोगों को कुमाऊं के  दूरस्थ इलाकों तक भी पहुंचाया। लेकिन धीरे-धीरे चुनौतियां बढ़ती गई। सरकारी परिवहन की बसों की संख्या बढ़ने और उन्हें मुनाफे वाले रास्तों में चलाने के कारण केमू की आय घटती गई और कंपनी घाटे में  जाने लगी, लेकिन इन सबके बावजूद केमू का महत्व आज भी बरकरार है।

केमू को आज भी पहाड़ों की लाइफलाइन माना जाता है जो कठिन और दुर्गम रास्तों में बसे चलाती हैं । खड़ी चढ़ाईयों , तंग सड़कों और कठिन मौसम का सामना करते हुए ये बसे लोगों को उन गांवों तक पहुंचाती है जहां अभी भी रोडवेज या निजी परिवहन सेवा उपलब्ध नहीं है।