कला में व्याख्या का प्रश्न : एक आलोचनात्मक विवेचना

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Published By Anjali Singh
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समकालीन कला विमर्श में यह प्रश्न लंबे समय से केंद्र में रहा है कि क्या किसी कलाकार को अपनी कलाकृति की व्याख्या प्रस्तुत करनी चाहिए, अथवा कला को उसकी स्वायत्त दृश्य-भाषा के माध्यम से ही समझा जाना चाहिए। यह बहस केवल दर्शक और कलाकार के संबंध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कला की प्रकृति, उसके संप्रेषण और सौंदर्यशास्त्रीय स्वायत्तता से भी गहराई से जुड़ी हुई है। आधुनिक और समकालीन कला की जटिलताओं ने इस प्रश्न को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है, विशेषकर तब जब कला संस्थान, क्यूरेटर और आलोचक व्याख्या को दर्शक तक पहुंचने का अनिवार्य माध्यम मानने लगे हैं।

पश्चिमी कला-चिंतन में इस बहस की जड़ें इमैनुएल कांट के “निर्णय की आलोचना” तक जाती हैं, जहां उन्होंने सौंदर्य-अनुभव को निःस्वार्थ आनंद के रूप में परिभाषित किया। कांट के अनुसार, कला का आनंद किसी अवधारणात्मक ज्ञान या बाह्य उद्देश्य पर निर्भर नहीं करता। इस दृष्टि से, किसी कलाकृति की पूर्व-व्याख्या दर्शक के स्वतंत्र सौंदर्य-अनुभव को बाधित कर सकती है। आगे चलकर क्लाइव बेल और रोजर फ्राई जैसे औपचारिकतावादी चिंतकों ने भी यह तर्क दिया कि कला का मूल्य उसके ‘सार्थक रूप’ में निहित है, न कि किसी कथ्य या व्याख्या में।

इसके विपरीत, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आर्थर डांटो और जॉर्ज डिकी जैसे दार्शनिकों ने यह स्थापित किया कि समकालीन कला को समझने के लिए संदर्भ, संस्थागत ढांचा और वैचारिक पृष्ठभूमि अत्यंत आवश्यक है। डांटो का प्रसिद्ध कथन- कला अपने आप में अर्थ का सन्निहित रूप है। यह संकेत करता है कि बिना वैचारिक संदर्भ के अनेक समकालीन कलाकृतियां ‘अदृश्य’ हो जाती हैं। इसी तर्क के आधार पर कलाकार के वक्तव्य और क्यूरेटरियल टेक्स्ट को समकालीन कला का अपरिहार्य अंग माना गया।

हालांकि इस प्रवृत्ति की आलोचना भी हुई है। सुसान सोंटैग ने अपने प्रसिद्ध निबंध “व्याख्या के विरुद्ध” में चेतावनी दी कि अत्यधिक व्याख्या कला के अनुभव को बौद्धिक बोझ में बदल देती है और उसकी संवेदी शक्ति को क्षीण कर देती है। उनके अनुसार, हमें कला को ‘महसूस’ करना चाहिए, न कि केवल ‘समझना’। भारतीय कला-चिंतन इस संदर्भ में एक भिन्न, लेकिन समृद्ध दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

भारतीय सौंदर्यशास्त्र में कला का केंद्र ‘अर्थ’ नहीं, बल्कि ‘अनुभव’ है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में प्रतिपादित रस-सिद्धांत के अनुसार, कला का उद्देश्य किसी संदेश को संप्रेषित करना नहीं, बल्कि दर्शक में रस-निष्पत्ति कराना है। यहां कलाकार की निजी भावना (भाव) और दर्शक का अनुभव (रस) एक साझा, किंतु अनिर्दिष्ट प्रक्रिया के माध्यम से जुड़ते हैं। इस परंपरा में शब्दात्मक व्याख्या को गौण माना गया है, कृति स्वयं अपना अर्थ प्रकट करती है।

आनंद कुमार स्वामी और के. सी. भट्टाचार्य जैसे आधुनिक भारतीय चिंतकों ने भी कला की स्वायत्तता पर बल दिया। कुमार स्वामी के अनुसार, पारंपरिक भारतीय कला ‘क्या कहा गया है’ से अधिक ‘कैसे कहा गया है’ पर केंद्रित होती है। इस दृष्टि से समकालीन भारतीय कला में अत्यधिक व्याख्यात्मक आग्रह एक औपनिवेशिक-बौद्धिक विरासत भी प्रतीत होता है, जो दृश्य अनुभव पर शब्दों की प्रधानता स्थापित करता है।

फिर भी, यह स्वीकार करना आवश्यक है कि समकालीन कला आज वैश्विक संस्थागत ढांचों, बिनाले, संग्रहालय, आर्ट फेयर के भीतर कार्य कर रही है, जहां व्याख्या एक प्रकार की मध्यस्थ भाषा बन चुकी है। प्रश्न यह नहीं है कि व्याख्या हो या न हो, बल्कि यह है कि व्याख्या कला का विकल्प न बन जाए, जब शब्द कृति पर हावी हो जाते हैं, तब कला का अनुभव कहीं पीछे रह जाता है।

अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कला की व्याख्या एक सहायक उपकरण हो सकती है, किंतु किसी भी स्थिति में अनिवार्य शर्त नहीं। भारतीय और पश्चिमी दोनों ही परंपराएं इस बात पर सहमत हैं कि कला का मूल उसके अनुभवात्मक और संवेदनात्मक पक्ष में निहित है। ऐसे में समकालीन कला में संतुलन की आवश्यकता है, जहां व्याख्या दर्शक को आमंत्रित करे, निर्देशित न करे और जहां कला स्वयं अपनी बहुअर्थी मौन में भी बोलने की स्वतंत्रता बनाए रखे। -सुमन कुमार सिंह, कलाकार/कला लेखक