गणतंत्र दिवस की झांकियों का सफर: बदलते भारत की कहानी
मशहूर कमेंटेटर जसदेव सिंह बताते थे कि गणतंत्र दिवस परेड के दौरान राजपथ (अब कर्तव्यपथ) पर दर्शक झांकियों का हर्षध्वनि से स्वागत करते हैं। ये सिलसिला अब भी जारी है। जसदेव सिंह ने करीब आधी सदी तक रेडियो और टीवी पर गणतंत्र दिवस परेड का आंखों देखा हाल सुनाया था। गणतंत्र दिवस की सुबह जब कर्तव्य पथ पर सूरज निकलता है, तो मार्च करते जवान, मिलिट्री बैंड, डांस या कोई करतब दिखाते स्कूली बच्चे और हवाई जहाजों के फ्लाईपास्ट के बीच झांकिया लाखों-करोड़ों लोगों का अपनी तरफ ध्यान खींचती हैं। ये चलती-फिरती कलाकृतियां रंग, आवाज और प्रतीकों से भरी होती हैं। ये भारत की एकता में विविधता की कहानी बयान करती हैं। - विवेक शुक्ला, पूर्व सूचना अधिकारी यूएई एंबेसी
1952 में शामिल की गईं झांकियां
गणतंत्र दिवस की परेड 1950 में शुरू हुई, लेकिन झांकियां औपचारिक रूप से 1952 में शामिल की गईं। शुरुआती सालों में झांकियां छोटी-मोटी होती थीं। ये संस्कृत और प्राकृत शब्द ‘झांकी’ से आई हैं, जिसका मतलब है नजारा या झलक। ये मंदिरों के रथ उत्सव और भक्ति काल की जुलूसों से प्रेरित हुआ करती थीं। कई झांकियों पर लोग जमे हुए पोज में खड़े होकर लोककथाएं, खेती या पौराणिक दृश्य दिखाते थे। गणतंत्र दिवस परेड में हर साल आमतौर पर 22 से 30 झांकियां होती हैं। ये राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, मंत्रालयों और प्रमुख सरकारी संस्थाओं की होती हैं।
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इनमें संगीत, लोक नृत्य, स्थानीय कपड़े और थीम वाली कहानियां दिखाकर भारत की संस्कृति, इतिहास और विकास के काम दिखाए जाते हैं। पहले झांकियां एकता सिखाती थीं, अब हाई-टेक वाली प्रगति की तस्वीर पेश करती हैं। ये झांकियां सिर्फ परेड का हिस्सा नहीं, बदलते भारत का आईना हैं। हम गरीब से अमीर, पिछड़े से आगे, साधारण से तकनीकी देश बने, लेकिन विविधता बरकरार हर राज्य अपनी कहानी लाता है।
झांकियां में संस्कृति के साथ सामाजिक मुद्दों का भी समावेश
अब जब हम झांकियां देखते हैं, तो याद आता है, 1950 का साधारण भारत आज दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है, स्पेस पावर, डेमोक्रेसी की मिसाल। झांकियां हमें बताती हैं कि विकास सिर्फ अर्थशास्त्र नहीं, संस्कृति, पर्यावरण, सामाजिक न्याय सबको साथ लेकर चलना है। आप कह सकते हैं कि झांकियों में 1970-80 के दशक में बदलाव आने लगा। अब झांकियां सिर्फ संस्कृति नहीं, सामाजिक मुद्दों पर फोकस करने लगीं। केरल ने 1976 में साक्षरता अभियान दिखाया। तमिलनाडु ने भरतनाट्यम नृत्य पेश किया। झांकियां 1991 के बाद उद्योग और शहरों की तरफ मुड़ीं। तब देश में आर्थिक उदारीकरण की बयार बहने लगी थी। असली बदलाव 1990 और 2000 के शुरुआत में आया। झांकियां बड़ी और कुछ हटकर बनने लगीं। ये हाई-टेक भी हो गईं। डीआरडीओ (DRDO) की झांकी 2000 के बाद गणतंत्र दिवस परेड का नियमित हिस्सा बनने लगीं। ये भारत की रक्षा प्रौद्योगिकियों और आत्मनिर्भरता को दर्शाती है, जिसमें नवीनतम मिसाइलें, रडार सिस्टम, ड्रोन रोधी प्रणालियां, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां, और स्वदेशी हथियार प्रदर्शित किए जाने लगे। इनका थीम अक्सर ‘रक्षा कवच’ होता है। कृषि मंत्रालय (या संबंधित कृषि निकाय जैसे ICAR) की झांकी गणतंत्र दिवस परेड का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है, जो अक्सर जैविक खेती, मोटे अनाज (मिलेट्स), पशुधन, या कृषि नवाचारों जैसे विषयों पर केंद्रित होती है। इसकी 2023 में ‘मिलेट ईयर’ पर आधारित झांकी थी।
सभी राज्यों में खास है दिल्ली की झांसी
इस बीच, सरकार ने 2024 में नया रोटेशन सिस्टम शुरू हुआ, ताकि हर राज्य/केंद्र शासित प्रदेश को हर तीन साल में कम से कम एक बार मौका मिले। पिछले साल 2025 की थीम थी ‘स्वर्णिम भारत: विरासत और विकास’। बीते साल 16 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की झांकियां निकलीं। उत्तर प्रदेश का महाकुंभ मेला को दर्शाती झांकी को बहुत पसंद किया गया था। चूंकि गणतंत्र दिवस का मुख्य आयोजन दिल्ली में होता है, इसलिए दिल्ली की झांकी को देखने के लिए जनता खासी उत्सुक रहती है। वैसे भी दिल्ली लघु भारत है। दिल्ली की झांकी 1952 की परेड का हिस्सा थी।

दिल्ली के शुरुआती दौर की झांकियों में सामाजिक और केन्द्र सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं पर ही फोकस रहता था। दिल्ली की 1965 की झांकी में देश के कृषि क्षेत्र में बढ़ते कदमों को दिखाया। तब तक देश में हरित क्रांति आ चुकी थी और उस महान क्रांति की नींव राजधानी के भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र ( पूसा) और जोंती गांव में ही रखी गई थी। 1965 की झांकी में जोंती के किसान भी शामिल थे। दिल्ली की 1966 की झांकी में सबको शिक्षा देने का वादा था। 1978 में वयस्क शिक्षा और 1979 की झांकी में शराबबंदी पर फोकस था, लेकिन 1990 के दशक बाद दिल्ली को विधानसभा मिल गई। तब यहां की झांकियों का रंग यहां के समाज से मेल खाने लगा। इसका नमूना मिला 1993 में जब दिल्ली की झांकी में यहां की गंगा-जमुनी तहजीब को पेश किया गया। इससे मिलती-जुलती थीम पर 1999 में शाहजहांबाद की जान और शान चांदनी चौक के जीवन, समाज और संस्कृति पर झांकी निकली थी। इसे बहुत पसंद किया गया था। करगिल की जंग विषय था दिल्ली की झांकी का साल 2000 में। करगिल की जंग में कैप्टन अनुज नैयर और कैप्टन मोहम्मद हनीफउद्दीन समेत दिल्ली के कई शूरवीरों ने अपनी जान का नजराना दिया था।
अमीर ख़ुसरो के जीवन पर आधारित झांकियां साल 2000 और फिर 2004 में निकलीं। मिर्जा गालिब की शख्सियत पर 2001 में झांकी निकली थी। मेट्रो रेल 2003 तथा 2006 दिल्ली की झांकी के फोकस में रही। दिल्ली की 2019 की झांकी में महात्मा गांधी पर फोकस किया गया। इसमें महात्मा गांधी के दिल्ली में बिताए गए 720 दिनों को दर्शाया गया। खैर, झांकियों का काम 26 जनवरी को खत्म नहीं होता। कई झाकियां बाद में सार्वजनिक जगहों पर लगाई जाती हैं या सांस्कृतिक आयोजनों, प्रदर्शनियों और स्कूलों में इस्तेमाल होती हैं। ये जैव-विविधता, विरासत संरक्षण, शहर के विकास और सामाजिक कामों के बारे में जागरूकता फैलाती रहती हैं।
