कागज की खोज
मानव सभ्यता के विकास में कागज़ का आविष्कार एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी घटना माना जाता है। आज जिस कागज़ को हम सामान्य और दैनिक उपयोग की वस्तु समझते हैं, उसने ज्ञान के संरक्षण, प्रसार और लोकतंत्रीकरण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कागज़ के आविष्कार से पहले मनुष्य पत्थर, ताम्रपत्र, ताड़पत्र, भोजपत्र, चमड़े और रेशम जैसे माध्यमों पर लिखता था, जो या तो भारी थे, महंगे थे या लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रहते थे।
इतिहासकारों के अनुसार कागज़ का आविष्कार 105 ईसवी में चीन में हुआ। इसका श्रेय हान वंश के शाही दरबार के अधिकारी त्साई लुन (Cai Lun) को दिया जाता है। उन्होंने पेड़ की छाल, पुराने कपड़े, मछली पकड़ने के जाल और बाँस जैसे रेशेदार पदार्थों को पानी में गलाकर, पीसकर और सुखाकर कागज़ बनाने की एक व्यावहारिक विधि विकसित की। यह पहले से मौजूद लेखन माध्यमों की तुलना में सस्ता, हल्का और अधिक उपयोगी था।
चीन में लंबे समय तक कागज़ बनाने की तकनीक को गुप्त रखा गया, लेकिन धीरे-धीरे यह ज्ञान अन्य क्षेत्रों तक फैल गया। आठवीं शताब्दी में यह तकनीक अरब दुनिया पहुँची, जहाँ बगदाद और समरकंद जैसे नगर कागज़ निर्माण के प्रमुख केंद्र बने। इसके बाद कागज़ भारत पहुँचा और यहाँ फारसी व अरबी पांडुलिपियों के लेखन में इसका व्यापक प्रयोग हुआ। तेरहवीं शताब्दी तक कागज़ यूरोप पहुँच चुका था, जहाँ बाद में छापेखाने के आविष्कार के साथ इसने ज्ञान क्रांति को जन्म दिया।
भारत में कागज बनाने की सबसे पहली मिल कश्मीर में लगाई गई थी, जिसे वहां के सुल्तान जैनुल आबिदीन ने स्थापित किया था। सन् 1887 मे भी कागज बनाने वाली मिल स्थापित की गई थी जिसका नाम था टीटा कागज मिल्स, लेकिन ये मिल कागज बनाने में असफल रही। आधुनिक कागज का उद्योग कलकत्ता में हुगली नदी के तट पर बाली नामक स्थान पर स्थापित किया गया।
वैज्ञानिक के बारे में
त्साई लुन (Cai Lun) चीन के हान राजवंश के समय एक प्रमुख विद्वान और शाही अधिकारी थे। उन्हें कागज़ के आविष्कारक के रूप में जाना जाता है। इससे पहले लेखन के लिए बाँस की पट्टियाँ और रेशम का प्रयोग होता था, जो भारी और महंगे थे। त्साई लुन के इस आविष्कार ने लेखन को सरल बनाया और ज्ञान, शिक्षा तथा प्रशासन के व्यापक प्रसार में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
