आर्ट गैलरी : समकालीन कला के विशिष्ट चित्रकार
जोगेन चौधरी के चित्रों में ग्रामीण जीवन और कोलकाता के विभिन्न पक्षों का चित्र दिखाई देता है। उनकी निजी चित्र शैली में क्रमशः परिवर्तन होता हुआ दिखाई देता है। बाद में उनकी चित्र शैली में मछली, तितली, सांप आदि को व्यंजक रूप में प्रस्तुत किया गया। वनस्पतियों के चित्रण में कहीं-कहीं खिला हुआ दिखाया गया, तो कहीं वनस्पतियों को तरोताजा दिखाया गया और कहीं उन्हें मुरझाया हुआ भी दिखाया गया है।
जोगेन चौधरी ने गणेश जी के अनेक चित्र बनाए हैं। इन्होंने गणेश जी को दुबला-पतला और व्यंग्यात्मक पद्धति में दिखाया गया है। जहां तक नारी आकृतियों की बात है, तो जोगेन चौधरी ने नारी को सुंदर मांसल दिखाने के साथ-साथ नारी आकृति को दुखी रूप में भी चित्रित किया है।
क्योंकि जोगेन चौधरी का जीवन प्रकृति के साथ घुला-मिला था, इसलिए इन्होंने अपने चित्रों में पुरुषों के चित्रों को कहीं-कहीं पत्तों की तरह, लता की भांति दिखाया और अंगों के उभार को फूलों की तरह दर्शाया। इनके चित्रों में चित्रित आकृतियों की अंकन शैली से व्यंग्य-विनोद के भाव उभरते हैं। स्थूल-स्थूल आकारों और तुनक मिजाज भंगिमाओं को भोले लगते चेहरे, नेताओं, व्यापारियों को देखकर आज के परिवेश और आज की यथार्थता दिखाई देती है। जोगेन चौधरी उन महत्वपूर्ण चित्रकारों में हैं, जिन्होंने समकालीन भारतीय कला में अपनी सशक्त अभिव्यक्ति से कला और समाज के रिश्ते को अच्छी तरह परिभाषित किया है।
जोगेन चौधरी के बारे में
जोगेन चौधरी का जन्म 19 फरवरी 1939 को पूर्वी बंगाल (आज का बांग्लादेश) के फरीदपुर कस्बे में हुआ था। इनके पिता प्रमथ नाथ चौधरी ब्राह्मण जमींदार थे। इनके पिता ने गांव में होने वाले नाटकों में कई पौराणिक आख्यानों को दीवारों में पेंट किया था और बहुत से हिंदू आइकॉन के चित्र भी बनाए थे। जोगेन चौधरी की माता अल्पना ड्राइंग में दक्ष थीं। 1947 तक जोगेन चौधरी गांव के परिवेश में ही रहे।
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1947 में भारत विभाजन के ठीक पहले जोगेन और उनके पिता कोलकाता शिफ्ट हो गए और 1948 के बाद पूरा परिवार कोलकाता में आकर बस गया। 1951 तक उनका पूरा परिवार अपने चाचा के पुलिस डिपार्टमेंट के क्वार्टर में ही रहता रहा। इसी मकान में जोगेन ने दीवारों पर अपनी पहली पेंटिंग बनाई। 1951 में जोगेन चौधरी का परिवार शहीद नगर कॉलोनी, ढाकुरिया, कोलकाता के दूसरे घर में शिफ्ट हो गया।
