समझना होगा कला और हस्तशिल्प के अंतर को
हस्तशिल्प और कला इन दोनों के बीच बहुत महीन विभाजन रेखा है और यह दोनों ही एक-दूसरे में रूपांतरित हो सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे पानी और भाप। एक निश्चित तापमान के बाद पानी स्वतः ही भाप में परिवर्तित जाता है और उस निश्चित तापमान से नीचे आते ही भाप पुनः पानी में बदल जाती है। अनेक हस्तशिल्पी अपने हस्तशिल्प कार्य को अपनी कल्पनाशीलता और शिल्प कौशल के संतुलित संयोजन से, उसे कलात्मकता के स्तर तक ले जाते हैं। तब उनका बनाया वह हस्तशिल्प एक कलाकृति के रूप में स्वीकार्य हो जाता है। फिर वह मात्र हस्तशिल्प न रहकर एक कलात्मक कलाकृति कहलाता है, परंतु यह अपवाद स्वरूप ही देखने में आता है, सामान्य हस्तशिल्प इस श्रेणी तक कभी नहीं पहुंच पाते।
अभिव्यक्ति एवं संप्रेषण का महत्व
हस्तशिल्प के कई कलाकार भी अपनी कलाकृति को इतना भावहीन एवं यांत्रिक बना देते हैं कि उन्हें कला की श्रेणी में रखना कठिन हो जाता है। हस्तशिल्प की मान्यता प्राप्त परिभाषा के अनुसार, पावर द्वारा चालित मशीनों के कम से कम उपयोग से मुख्यतः हाथों द्वारा बनाई गई कोई भी सुंदर, उपयोगी एवं टिकाऊ वास्तु हस्तशिल्प कहलाती है। इस परिभाषा के अनुसार हस्तशिल्प में उपयोग एवं टिकाऊ पक्ष उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि हस्तशिल्प का सुदर्शन होना।
हस्त शिल्प का यही पक्ष उसे कला के क्षेत्र से बाहर करता है, क्योंकि कला में उपयोग एवं टिकाऊ होने की कोई शर्त नहीं है। कला की अनेक परिभाषाओं में उसे आत्म अभिव्यक्ति से जोड़ा गया है, वहां दृष्टि, संप्रेषण और सृजन की बात की गई है। हस्तशिल्प और कला की परिभाषाओं में यह अंतर ही उनके वास्तविक चरित्र को उजागर करता है। हस्तशिल्प में सौंदर्य के साथ उपयोगिता पक्ष का बाहुल्य है, जबकि कला में सौंदर्य सृजन के साथ अभिव्यक्ति एवं संप्रेषण महत्व रखता है।
हस्तशिल्प में अनुशासन और दक्षता
कला के सृजन का कोई निश्चित नियम या पूर्वनिर्धारित फार्मूला नहीं होता। कला को जबरन गढ़ा नहीं जा सकता; वह तो स्वयं अपनी अभिव्यक्ति का मार्ग खोज लेती है। कलाकार केवल माध्यम होता है, सृजन की प्रक्रिया उसके भीतर स्वतः घटित होती है। इसके विपरीत हस्तशिल्प एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया पर आधारित होता है, जहां निर्माण के स्पष्ट नियम, तकनीक और तयशुदा ढाँचे मौजूद होते हैं। हस्तशिल्प में यह लगभग निश्चित रहता है कि अंत में उत्पाद कैसा होगा, जबकि कला में अंतिम परिणाम सृजन की यात्रा पूरी होने के बाद ही सामने आता है। कला की यही अनिश्चितता उसे रोमांचक और जीवंत बनाती है। यह अनपेक्षित मोड़, आकस्मिक अनुभूतियाँ और भावनात्मक गहराई ही कला को विशिष्ट बनाती हैं। कला-सृजन के लिए उन्मुक्त चिंतन, कल्पनाशीलता और आत्म-विस्मृति अत्यंत आवश्यक होती है। जब कलाकार अपने अहं और चेतन नियंत्रण से मुक्त होकर सृजन में डूब जाता है, तभी कला का वास्तविक रूप प्रकट होता है।
हस्तशिल्प में अनुशासन, हस्तकौशल और दक्षता का विशेष महत्व होता है। वहां अभ्यास, परंपरा और तकनीकी निपुणता ही प्रमुख आधार हैं। किंतु हस्तशिल्प में भावनाओं का गहन संप्रेषण, अंतर्मन की अभिव्यक्ति या किसी अनदेखे, अमूर्त संसार की रचना का उद्देश्य नहीं होता। यही तत्व कला को हस्तशिल्प से अलग और उच्चतर आयाम प्रदान करते हैं। कला केवल रूप या संरचना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह संवेदना, अनुभूति और विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है। उसमें भाव, कल्पना और स्वतंत्रता का समन्वय होता है, जो दर्शक या श्रोता के भीतर भी एक नई चेतना का संचार करता है। इस प्रकार कला और हस्तशिल्प के बीच मूल अंतर तकनीक का नहीं, बल्कि भाव, स्वतंत्रता और सृजनात्मक अनिश्चितता का है और यही कला की आत्मा है।
