विमर्श: ‘ आधे आसमान’ से ही पूर्ण होगा आकाश

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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स्त्री सृष्टि की रचयिता है, जो अपने गर्भ से ही जीवन का प्रारंभ करती है। वह परिवार की आत्मा है और समाज की कुशल वास्तुकार है, जो अपनी बौद्धिकता एवं लगन से परिवार में मिठास एवं समाज को प्रगतिशील बनाती है। स्त्री के बिना संसार की कल्पना नहीं की जा सकती है, क्योंकि वह जीवन है। स्त्री के सम्मान में ही सृष्टि का संतुलन एवं समाज का उत्थान है, लेकिन फिर भी सदियों से संसार की स्त्रियां उपेक्षित रही है।

यह दोहरी प्रवृति हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना है, जो आज के वैज्ञानिक युग में भी व्याप्त है। एक ओर जहां हमारे देश में स्त्रियों को मौखिक रूप से देवी का स्थान दिया गया है, वहीं पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने आज भी स्त्रियों को बंधनों से जकड़े रखा। इसके पूर्व ही सती प्रथा, बाल विवाह और कन्या भ्रूण हत्या जैसी अनेक कुरीतियों द्वारा शोषण किया गया और आज भी देश में शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में महिलाएं पिछड़ी हुई हैं और महिलाओं के साथ बालात्कार एवं हिंसा की खबरें तो रोज की बात हो गई है। वर्तमान आंकड़े इस कड़वी हकीकत को और स्पष्ट करते हैं। 

वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट 2025 के अनुसार भारत 148 देशों में 131 वें स्थान पर है, शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति होने के साथ महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ी है और उच्च शिक्षा में नामांकन लगभग 46 प्रतिशत तक पहुंच गया है, लेकिन परिवार और देश की अर्थव्यवस्था में भागीदारी काफी कमजोर है। महिला श्रम बल भागीदारी दर थोड़ा बढ़ी, परंतु पुरुषों की तुलना में अभी भी बहुत ज्यादा कमजोर है। महिलाएं घरेलू कामों में अधिक समय बिताती हैं, जिससे उनकी वेतन वाली नौकरियों में भागीदारी सीमित रहती है। देश में महिलाओं के साथ उत्पीड़न एवं हिंसा अधिक चिंता का विषय है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के खिलाफ अपराधों में निरंतर वृद्धि हो रही है। 

कार्यस्थल पर उत्पीड़न, साइबर क्राइम और घरेलू हिंसा आज भी लाखों महिलाओं की आजादी छीन रही है। अक्सर सुनने को  मिलता है महिलाओं को नौकरी में आरक्षण मिला, यात्रा में भी सुविधा मिली, शिक्षा में साइकिल एवं पोशाक की सुविधा मिल तो गई, अब और कितनी बराबरी चाहिए? यह तंज करने से पहले चिंतन करने की आवश्यकता है कि क्या ये सुविधाएं और आरक्षण ने महिलाओं को परिवारिक-सामाजिक स्तर पर पुरुषों के बराबर अधिकार और स्वतंत्रता दे रही है? अगर लैंगिक बराबरी मिल रही है, तब देश में ही असुरक्षित कैसे है? न आजादी से कही आ-जा सकती, न आजादी से पढ़ लिख सकती, न आजादी से कमा सकती और न ही आजादी से जी सकती है।  

आजकल एक और तंज कसे जा रहे है कि ‘स्त्रियों को थोड़ी आजादी क्या मिली संस्कारहीन बनती जा रही है।’ इस तंज पर एक सवाल की ‘क्या संस्कारहीन होने के पैमाने एवं जेंडर निर्धारित होता है?’ सदियों से नशे की लत, जुआ, झूठ, धोखा, हिंसा, व्यभिचार जैसी आदतें पुरुषों में भी रही हैं, लेकिन उन्हें ‘संस्कारहीन’ कहकर समाज ने कभी इतना तीखा तंज नहीं कसा, जितना आज एक लड़की को खुलकर बोलने, देर रात बाहर रहने, करियर चुनने या अपनी पसंद की शादी करने पर कसता है। यह दोहरा मापदंड संस्कार को परिभाषित नहीं करता है। संस्कार असल में नैतिकता, ईमानदारी, सम्मान, जिम्मेदारी और मानवता का नाम है, जो नैतिकता और मर्यादा की सीमा से घिरी है। महिलाओं की बढ़ती आजादी ने समाज को संस्कारहीन नहीं बनाया, बल्कि हिंसा और असमानता को कम करने की कोशिश की है।- अंबिका अंबी

 

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