अजनबी शहर, नई दृष्टि और आत्मखोज की यात्रा

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Published By Anjali Singh
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दिसंबर 2019 की वह रात आज भी मेरी स्मृतियों में जमी हुई ठंड की तरह ताज़ा है। विमान जब पेरिस की धरती पर उतरा, तब रात आधी बीत चुकी थी। घड़ी ने मध्यरात्रि पार कर ली थी और तापमान शून्य से नीचे जा चुका था। भारत की परिचित गर्माहट से निकलकर यूरोप की उस ठिठुरती हवा में कदम रखते ही मुझे पहली बार अपने निर्णय का वास्तविक अर्थ समझ आया। यह केवल एक यात्रा नहीं थी, यह मेरे जीवन का पहला पूर्णतः एकल अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिक अभियान था। मैं वहां एक शोध प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने पहुंची थीं।

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विश्व के अग्रणी वैज्ञानिकों के बीच, न्यूरोसाइंस और मस्तिष्क अनुसंधान के अत्याधुनिक वातावरण में। परंतु उस क्षण, जब हवाई अड्डे के स्वचालित दरवाजे खुलते ही बर्फीली हवा चेहरे से टकराई, मेरे भीतर वैज्ञानिक जिज्ञासा से पहले एक साधारण यात्री का संकोच जाग उठा। भाषा अनजानी, उच्चारण अपरिचित और शहर पूर्णतः नया, सब कुछ एक साथ मेरे सामने खड़ा था। फिर भी, उस ठंड में एक विचित्र ऊर्जा थी, जैसे प्रकृति स्वयं कह रही हो कि असुविधा ही विकास का पहला कदम है।- डॉ.गीतिका श्रीवास्तव, सह आचार्य, भौतिकी एवं इलेक्ट्रॉनिस विभाग, डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय।

अधूरे वाक्यों के सहारे संवाद का पुल

पेरिस पहुंचते ही मुझे पहली चुनौती भाषा की मिली। अंग्रेजी का प्रयोग सीमित था और फ्रेंच उच्चारण मेरे लिए बिल्कुल नया। स्थानों के नाम, मेट्रो स्टेशनों की घोषणाएं, यहां तक कि लोगों के नाम भी मेरे लिए मानो किसी नए संगीत की धुन थे, जिन्हें समझने में समय लगना स्वाभाविक था। एक साधारण प्रश्न पूछना भी कई बार एक छोटी-सी यात्रा बन जाता। मैं शब्द खोजती, सामने वाला व्यक्ति मुस्कुराकर फ्रेंच में कुछ कहता और हम दोनों ही संकेतों और अधूरे वाक्यों के सहारे संवाद का पुल बनाते, लेकिन यही अनुभव धीरे-धीरे मुझे एक महत्वपूर्ण जीवन पाठ सिखाने लगा। भाषा केवल शब्दों का माध्यम नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का विस्तार है। मुस्कान, सहयोग, धैर्य और सम्मान ये सार्वभौमिक भाषाएं हैं, जिन्हें अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती। कुछ ही दिनों में, विभिन्न देशों से आए प्रतिभागियों के साथ संवाद सहज होने लगा। 

वैज्ञानिक वातावरण

शोध प्रशिक्षण कार्यक्रम का वातावरण अत्यंत अनुशासित था। समय की पाबंदी केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि कार्य संस्कृति का मूल तत्व थी। प्रत्येक सत्र निर्धारित समय पर प्रारंभ और समाप्त होता, प्रत्येक चर्चा सटीक और गहन होती। यहां मैंने पहली बार देखा कि ज्ञान केवल जानकारी का संचय नहीं, बल्कि सोचने की विधि है। एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जो हर प्रश्न को गहराई से देखने की प्रेरणा देता है। शीर्ष शोधकर्ताओं के साथ संवाद करना किसी पुस्तक के जीवंत हो उठने जैसा अनुभव था। जिन सिद्धांतों को मैंने वर्षों तक पढ़ा था, वे अब प्रयोगशालाओं में आकार लेते दिख रहे थे। जटिल उपकरण, उन्नत तकनीकें और विचारों की निरंतर धारा यह सब मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। सबसे महत्वपूर्ण यह था कि वहां प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग की भावना थी। प्रश्न पूछना प्रोत्साहित किया जाता था, जिज्ञासा को सम्मान मिलता था और विचारों का आदान-प्रदान खुलेपन से होता था। मुझे यह समझ में आया कि सच्चा वैज्ञानिक वातावरण वही है, जहां ज्ञान साझा करने से बढ़ता है, छिपाने से नहीं।

 एफिल टॉवर और पेरिस की सुंदरता

औपचारिक प्रशिक्षण के बाद का समय मेरा अपना था। मैंने निर्णय लिया कि इस शहर को केवल पर्यटक की तरह नहीं, बल्कि एक खोजकर्ता की तरह देखूंगी। पैदल चलकर, गलियों को महसूस करके और शहर की धड़कन को सुनकर। पेरिस की सड़कों पर अकेले चलना एक अद्भुत अनुभव था। ठंडी हवा, हल्की रोशनी, और इतिहास से भरी इमारतें हर मोड़ एक कहानी कहता प्रतीत होता। सीन नदी के किनारे टहलते हुए मुझे लगा कि यह शहर केवल स्थापत्य का नहीं, विचारों का शहर है। यहां कला, दर्शन, साहित्य और विज्ञान सब एक साथ सांस लेते हैं, लैटिन क्वार्टर की बौद्धिक ऊर्जा, मोंटमार्त्र की कलात्मक आत्मा, संग्रहालयों की गंभीरता और कैफे की सहजता हर स्थान अपने भीतर एक अलग दुनिया समेटे हुए था। 

फिर वह क्षण आया, जिसे शब्दों में बांधना आज भी कठिन है। जब मैंने पहली बार एफिल टॉवर को सामने देखा। वह वही संरचना थी, जिसे मैंने बचपन में पुस्तकों के पन्नों पर देखा था। भूगोल की किताबों में, पोस्टकार्डों में और कल्पनाओं में, लेकिन वास्तविकता में उसे देखना एक अलग ही अनुभव था। रात के अंधेरे में रोशनी से जगमगाता वह टॉवर केवल लोहे की संरचना नहीं था। वह समय, सपनों और उपलब्धि का प्रतीक था। उस क्षण मुझे लगा कि जीवन में देखी हुई चीजें सपनों को आकार देती हैं और जब वे सपने साकार होते हैं, तो व्यक्ति स्वयं को नए रूप में पहचानता है। पेरिस की सुंदरता केवल उसकी इमारतों में नहीं, बल्कि उसकी लय में है। लोग पैदल खूब चलते हैं, बातचीत में समय लेते हैं और जीवन को अनुभव की तरह जीते हैं। यह शहर आपको रुकना सिखाता है। देखने के लिए, सोचने के लिए और महसूस करने के लिए। लूव्र संग्रहालय की भव्यता, नोट्रे-डेम की गंभीरता, सीन के पुलों की शांति और छोटे-छोटे कैफे की गर्माहट सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जहां मन स्वतः चिंतनशील हो जाता है।